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पुस्तक मेला नहीं, सांस्कृतिक आंदोलन
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पुस्तक मेला नहीं, सांस्कृतिक आंदोलन

DSC_0155अगर किसी पुस्तक मेले में एक दिन में एक लाख लोग पहुंचते हों, तो इससे किताबों के प्रति प्रेम को लेकर एक आश्‍वस्ति होती है. यही हुआ हाल ही में संपन्न पटना पुस्तक मेला में. पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित इस पुस्तक मेला के बीच आए एक रविवार को वहां पहुंचने वालों की संख्या एक लाख के पार चली गई. इसके अलावा पुस्तक मेला से जुड़े लोगों का अनुमान है कि दस दिनों में पुस्तक मेला में किताबों की बिक्री का आंकड़ा भी क़रीब छह करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया. पटना पुस्तक मेला में ज़्यादातर किताबें हिंदी की थीं, लिहाजा इसे एक शुभ संकेत माना जा सकता है. एक तरफ़ हिंदी में साहित्यिक कृतियों की बिक्री कम होने की बात हो रही है और उस पर चिंता जताई जा रही है, वहीं साहित्येतर किताबों में पाठकों की बढ़ती रुचि को रेखांकित किया जा रहा है. पटना पुस्तक मेला इस लिहाज से अन्य पुस्तक मेलों से थोड़ा अलग है कि यहां किताबों की दुकानों के अलावा सिनेमा, पेंटिंग, नाटक आदि पर भी विमर्श होता है. इस साल तो पटना पुस्तक मेला में संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से देशज नामक एक सांस्कृतिक आयोजन भी हुआ, जिसमें मशहूर पंडवानी लोक नाट्य गायिका तीजन बाई से लेकर मणिपुर और कश्मीर की नाट्य मंडलियों ने अपनी प्रस्तुति दी. कश्मीर का गोसाईं पाथेर जो है, वह वहां की भांड पाथेर परंपरा का नाटक है, जिसे कश्मीर घाटी के भांड कलाकार लंबे समय से मंचित करते आ रहे हैं. बिहार के दर्शकों के लिए यह एकदम नया अनुभव था. इन नाटकों की प्रस्तुति इतनी भव्य थी कि भाषा भी आड़े नहीं आ रही थी.
दरअसल, अगर हम देखें, तो पटना पुस्तक मेला ने बिहार में पाठकों को संस्कारित करने का काम भी किया. बिहार में एक सांस्कृतिक माहौल होने के पीछे पटना पुस्तक मेला का बड़ा हाथ है. पिछले दो सालों से पटना पुस्तक मेला को नज़दीक से देखने का अवसर मिला है. वहां जाकर लगा कि एक ओर जहां तमाम लिटरेचर फेस्टिवल साहित्य के मीना बाज़ार में तब्दील होते जा रहे हैं, जहां साहित्य एवं साहित्यकारों को उपभोक्ता वस्तु में तब्दील करने का खेल खेला जा रहा है, जहां प्रायोजकों के हिसाब से सत्र एवं वक्ता तय किए जाते हैं, वहीं पटना पुस्तक मेला देश की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत को बचाने और उसे नए पाठकों तक पहुंचाने का उपक्रम कर रहा है. संवाद कार्यक्रमों के ज़रिये पाठकों को साहित्य की विभिन्न विधाओं की चिंताओं और उसकी नई प्रवृत्तियों से अवगत कराने का काम किया जा रहा है. भगवान दास मोरवाल के नए उपन्यास-नरक मसीहा के विमोचन के मौ़के पर एक वरिष्ठ आलोचक ने आलोचना में उठाने-गिराने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया, तो इक्कीसवीं सदी की पाठकीयता पर भी जमकर चर्चा हुई. पाठकीयता के संकट के बीच उसे बढ़ाने के उपायों पर रोशनी डालने के साथ ही सोशल मीडिया में हिंदी के साहित्यकारों की कम उपस्थिति पर भी चिंता व्यक्त की गई. प्रकाशन कारोबार में आ रहे बदलावों पर हार्पर कालिंस की मुख्य संपादक कार्तिका वीके ने विस्तार से पाठकों को बताया. इस मौ़के पर पटना पुस्तक मेला के आयोजक सीडीआर के अध्यक्ष रत्नेश्‍वर एवं रंगकर्मी अनीस अंकुर भी मौजूद थे.

हिंदी साहित्य और पाठकीयता पर हिंदी में लंबे समय से चर्चा होती रही है. लेखकों और प्रकाशकों के बीच पाठकों की संख्या को लेकर लंबे समय से विवाद होता रहा है. साहित्य सृजन कर रहे लेखकों को लगता है कि उनकी कृतियां हज़ारों में बिकती हैं और प्रकाशक घपला करते हैं. वे बिक्री के सही आंकड़े नहीं बताते.

हिंदी साहित्य और पाठकीयता पर हिंदी में लंबे समय से चर्चा होती रही है. लेखकों और प्रकाशकों के बीच पाठकों की संख्या को लेकर लंबे समय से विवाद होता रहा है. साहित्य सृजन कर रहे लेखकों को लगता है कि उनकी कृतियां हज़ारों में बिकती हैं और प्रकाशक घपला करते हैं. वे बिक्री के सही आंकड़े नहीं बताते. इसी तरह प्रकाशकों का मानना है कि साहित्य के पाठक लगातार कम होते जा रहे हैं और साहित्यिक कृतियां बिकती नहीं हैं. दोनों के तर्क कुछ विरोधाभासों के बावजूद अपनी-अपनी जगह सही हो सकते हैं. दरअसल, साहित्य और पाठकीयता, यह विषय बहुत गंभीर है और उतने ही गंभीर मंथन की मांग करता है. अगर हम देखें, तो आज़ादी के पहले हिंदी में दस प्रकाशक भी नहीं थे और इस वक्त एक अनुमान के मुताबिक, तीन सौ से ज़्यादा प्रकाशक साहित्यिक कृतियां छाप रहे हैं. प्रकाशन जगत के जानकारों के मुताबिक, हर साल हिंदी की क़रीब दो से ढाई हज़ार किताबें छपती हैं. अगर पाठक नहीं हैं, तो किताबें छपती क्यों हैं? यह एक बड़ा सवाल है, जिससे टकराने के लिए न तो लेखक तैयार हैं और न प्रकाशक.
क्या लेखकों एवं प्रकाशकों ने अपना पाठक वर्ग तैयार करने के लिए कोई उपाय किया? क्या लेखकों ने एक खास ढर्रे की रचनाएं लिखने के अलावा किसी अन्य विषय को अपने लेखन में उठाया? अगर इस बिंदु पर विचार करते हैं, तो कम से कम हिंदी साहित्य में एक खास किस्म का सन्नाटा नज़र आता है. हिंदी के लेखक बदलते जमाने के साथ अपने लेखन को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं.
इक्कीसवीं सदी में पाठकीयता पर जब हम बात करते हैं, तो कह सकते हैं कि हमने इस सदी में पाठक बनाने के लिए प्रयत्न नहीं किए. अगर हम साठ से लेकर अस्सी के दशक को देखें, तो उस वक्त पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने हमारे देश में एक पाठक वर्ग तैयार करने में अहम भूमिका निभाई.
पीपीएच ने उन दिनों एक खास विचारधारा की किताबें छापकर सस्ते में बेचना शुरू किया. हर छोटे से लेकर बड़े शहर तक रूस के लेखकों की किताबें सहज, सस्ती और हिंदी में उपलब्ध होती थीं. उसके इस प्रयास से हिंदी में एक विशाल पाठक वर्ग तैयार हुआ. सोवियत रूस के विघटन के बाद जब पीपीएच की शाखाएं बंद होने लगीं, तो न हिंदी के लेखकों ने और न हिंदी के प्रकाशकों ने उस खाली जगह को भरने की कोशिश की. प्रतिबद्ध साहित्य पढ़वाने की जिद और तिकड़म ने पाठकों को दूर किया. फॉर्मूला-बद्ध रचनाओं ने पाठकों को निराश किया. नई सोच और नए विचार सामने नहीं आ पाए. विचारधारा ने ऐसी गिरोहबंदी कर दी कि नए विचार और नई सोच को सामने आने ही नहीं दिया गया. जिसने भी आने की कोशिश की, वह चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे सुनियोजित तरीके से हाशिये पर रख दिया गया. किसी को कलावादी कहकर, तो किसी को कुछ अन्य विशेषण से नवाज कर. इस प्रवृत्ति के शिकार हुए सबसे बड़े लेखक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय और रामधारी सिंह दिनकर थे. इन दोनों लेखकों का अब तक उचित मूल्यांकन नहीं हो पाया है.
दूसरा नुक़सान यह हुआ कि विचारधारा और प्रतिबद्धता के आतंक में न तो नई भाषा गढ़ी जा सकी और न उस तरह के विषयों को छुआ गया, जो समय के साथ बदलती पाठकों की रुचि का ध्यान रख सकते. यहां कुछ लेखकों को
विचारधारा के आतंक शब्द पर आपत्ति हो सकती है, लेकिन यह तथ्य है कि साहित्य एवं विश्‍वविद्यालयों से लेकर साहित्य अकादमियों तक एक खास विचारधारा के पोषकों का आतंक था. जन और लोक की बात करने वाले इन विचार पोषकों की आस्था न तो उससे बने जनतंत्र में है और न लोकतंत्र में. लेखक संघों का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जब भी किसी ने विचारधारा पर सवाल खड़ा करने की कोशिश की, उसे संगठन बदर कर दिया गया. ये बातें विषय से इतर लग सकती हैं. मन में यह प्रश्‍न उठ सकता है कि इससे पाठकीयता को क्या लेना-देना है. संभव है कि इस प्रसंग का पाठकीयता से प्रत्यक्ष संबंध न हो, लेकिन इसने परोक्ष रूप से पाठकीयता के विस्तार को बाधित किया है. वह इस तरह से कि अगर किसी ने विचारधारा के दायरे से बाहर जाकर विषय उठाए और उन्हें पाठकों के सामने पेश करने की कोशिश की, तो उसे हतोत्साहित किया गया. नतीजा यह हुआ कि साहित्य से नवीन विषय छूटते चले गए और पाठक एक ही विषय को बार-बार पढ़कर उबने लगे. साहित्यकारों ने पाठकों की बदलती रुचि का ख्याल नहीं रखा. वे उसी सोच को दिल से लगाए बैठे रहे कि हम जो लिखेंगे, वही तो पाठक पढ़ेंगे. मैंने अभी हाल में लेखकों की इस सोच को तानाशाही कह दिया, तो बखेड़ा खड़ा हो गया. पाठकों की रुचि और बदलते मिजाज का ध्यान न रखना तो एक तरह की तानाशाही है ही.
दरअसल, नए जमाने के पाठक बेहद मुखर और अपनी रुचि को हासिल करने के लिए बेताब हैं. नए पाठक इस बात का भी ख्याल रख रहे हैं कि वे किस प्लेटफॉर्म पर कोई रचना पढ़ेंगे. अगर अब गंभीरता से पाठकों की बदलती आदत पर विचार करें, तो पाते हैं कि उनमें काफी बदलाव आया है. पहले पाठक सुबह उठकर अख़बार का इंतज़ार करता था और आते ही उसे पढ़ता था, लेकिन अब वह अख़बार आने का इंतज़ार नहीं करता, ख़बरें पहले जान लेना चाहता है. ख़बरों के विस्तार की रुचि वाले पाठक अख़बार अवश्य देखते हैं. ख़बरों को जानने की चाहत उनसे इंटरनेट सर्फ कराते हैं. इसी तरह पहले पाठक किताबों का इंतज़ार करता था. किताबों की दुकानें ख़त्म होते चले जाने और इंटरनेट पर कृतियों की उपलब्धता बढ़ने से पाठकों ने इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना शुरू किया. हो सकता है कि अभी किंडल और आई-फोन या आई-पैड पर पाठकों की संख्या कम दिखाई दे, लेकिन जैसे-जैसे देश में इंटरनेट का घनत्व बढ़ेगा, वैसे-वैसे पाठकों की इस प्लेटफॉर्म पर संख्या बढ़ती जाएगी. इसके अलावा न्यूज हंट जैसे ऐप हैं, जहां बेहद कम क़ीमत पर हिंदी साहित्य की कई महत्वपूर्ण रचनाएं उपलब्ध हैं. यह बात कई तरह के शोध के नतीजों के रूप में सामने आई है. दरअसल, अगर हम देखें, तो पाठकीयता के बढ़ने-घटने के लिए कई कड़ियां ज़िम्मेदार हैं. अगर हम पाठकीयता को एक व्यापक संदर्भ में देखें, तो इसके लिए कोई एक चीज ज़िम्मेदार नहीं है. यह एक पूरा ईको सिस्टम है, जिसमें सरकार, टेलिकॉम, सर्च इंजन, लेखक, डिवाइस मेकर, प्रकाशक, मीडिया एवं मीडिया मालिक शामिल हैं. इन सबको मिलाकर पाठकीयता का निर्माण होता है.
सरकार, प्रकाशक और लेखक की भूमिका सबको ज्ञात है. टेलिकॉम यानी फोन और उसमें लोड सॉफ्टवेयर, सर्चे इंजन, जहां जाकर कोई भी अपनी मनपसंद रचना को ढूंढ सकता है. पाठकीयता के निर्माण का एक पहलू डिवाइस मेकर भी हैं. डिवाइस यथा किंडल और आई- प्लेटफॉर्म, जहां रचनाओं को डाउनलोड करके पढ़ा जा सकता है. प्रकाशक पाठकीयता बढ़ाने और नए पाठकों के लिए अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर रचनाओं को उपलब्ध कराने में महती भूमिका निभाता है. पाठकीयता बढ़ाने में मीडिया का भी बहुत योगदान रहता है. साहित्य को लेकर हाल के दिनों में मीडिया में एक खास किस्म की उदासीनता देखने को मिली है. इस उदासीनता तो दूर करके एक उत्साही मीडिया की दरकार है. हिंदी साहित्य जगत को पाठकीयता बढ़ाने के लिए सबसे ज़्यादा जरूरत इस बात की है कि वह इस ईको सिस्टम का संतुलन बरकरार रखे. इसके अलावा लेखकों और प्रकाशकों को नए पाठकों को साहित्य की ओर आकर्षित करने के लिए नित नए उपक्रम करने होंगे. पाठकों के साथ लेखकों का जो संवाद नहीं हो रहा है, वह पाठकीयता की प्रगति की राह में सबसे बड़ी बाधा है. लेखकों को चाहिए कि वे इंटरनेट के माध्यम से पाठकों के साथ जुड़ें और उनसे अपनी रचनाओं पर फीडबैक लें.
फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे की लेखिका ई एल जेम्स ने ट्राइलॉजी लिखने से पहले इंटरनेट पर एक सीरीज लिखी थी और बाद में पाठकों की राय पर उसे उपन्यास का रूप दिया. उसकी सफलता अब इतिहास में दर्ज हो चुकी है और उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है. इन सबसे ऊपर हिंदी के लेखकों को नए-नए विषय भी ढूंढने होंगे. जिस तरह हिंदी साहित्य से प्रेम गायब हो गया है, उसे भी वापस लेकर आना होगा. आज भी पूरी दुनिया में प्रेम कहानियों के पाठक सबसे ज़्यादा हैं. हिंदी में बेहतरीन प्रेम कथा की बात करने पर धर्मवीर भारती का उपन्यास-गुनाहों के देवता और मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास-कसप ही याद आते हैं. हाल में संपन्न हुए पटना पुस्तक मेला से यह संकेत मिला कि पढ़ने की भूख है. वहां एक दिन में एक लाख लोगों के पहुंचने से उम्मीद तो बंधती ही है. ज़रूरत इस बात की है कि यह उम्मीद कायम रखते हुए इसे नई ऊंचाई दी जाए. पटना के अलावा कोलकाता पुस्तक मेला में भी सांस्कृतिक विरासत बचाने का उपक्रम होता है. साहित्य को उपभोग की वस्तु में तब्दील करते विभिन्न लिटरेचर फेस्टिवल्स के बीच पुस्तक मेला अपनी अलग पहचान पर कायम है.

1 comment

  • किताबों के पाठक तो मौजुद हैं पर किताबे नहीं हैं। मैं आगरा में रहता हूँ और यहाँ हालत ये हैं कि साहित्य से जुडी कोई किताब नहीं मिलती अगले साल दिल्ली पुस्तक मेले में गया वहाँ से भी निराश होकर लोटा जो किताबे चाहिए थी वहीं नहीं मिली । क्या करे पाठक कहाँ जाए।

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