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साहित्यिक विवाद का वधस्थल फेसबुक

साहित्यिक विवाद का वधस्थल फेसबुक

LITTERATURE

LITTERATUREसाहित्यिक पत्रिका ‘पाखी’ में छपे हिंदी के लेखक-अध्यापक विश्वनाथ त्रिपाठी से की गई बातचीत पर जारी विवाद के बीच मशहूर कथाकार ह्रषिकेश सुलभ ने फेसबुक पर दो महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं. एक तो उन्होंने लिखा ‘फेसबुक एक वधस्थल है.’ दूसरी टिप्पणी भदेस लोकोक्ति में थी. उन्होंने लिखा ‘कुछ लोग पूतवो मीठ, भतरो मीठ में लगे हैं. ऐसे लोग वधिकों से कम सावधान नहीं हैं.’ सुलभ जी की ये दो टिप्पणियां फेसबुक पर सक्रिय लिखने पढ़ने वालों की मानसिकता को लेकर बेहद सटीक हैं. इन दिनों साहित्यकारों को जिस तरह से फेसबुक पर घेर कर मारने या मारने की कोशिश की प्रवृत्ति बढ़ी है, उसने इस मंच को एक वधस्थल में तब्दील कर दिया है. फेसबुक पर कुछ ऐसे साहित्यिक गिरोह सक्रिय हैं, जो सुबह से ही ‘शिकार’ की तलाश में रहते हैं.

चतुर शिकारी की तरह उनको यह मालूम होता है कि किस मुद्दे को कितना हवा देकर किसी का वध करना है. विश्वनाथ त्रिपाठी के प्रकरण को ही अगर देखें, तो दो-तीन स्वयंभू लोग बजाए इस मसले को तार्किक परिणति तक ले जाने की कोशिश करने के, अपना-अपना हिसाब बराबर करने में लग गए. किसी को प्रेम भारद्वाज से दिक्कत थी तो वो प्रेम भारद्वाज को घेरने लग गए, किसी को अपूर्व जोशी से परेशानी थी तो वो जोशी पर हमलावर होने लगे. किसी को विश्वनाथ त्रिपाठी से अपना स्कोर सेट करना था, तो वो उसमें लग गए.

दूसरी बात जो सुलभ ने कही उसका अर्थ है कि बेटा भी प्यारा और पति भी प्यारा. इस पूरे विवाद में तो कई ऐसे लोग दिखे जो पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों तरह की टिप्पणियों से सहमति जता रहे थे. यहां भी सहमत वहां भी सहमत. दरअसल ऐसे लोगों को पता ही नहीं चलता है कि साहित्यिक विवाद में किस तरह का स्टैंड लेना है. उनको तो बस फेसबुक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होती है. उनको लगता है कि साहित्य समाज उनकी उपस्थिति को दर्ज करे, लेकिन उपस्थिति दर्ज करवाने के चक्कर में इस तरह के लोग लगातार हास्यास्पद होते चले जाते हैं.

इस पूरे विवाद में साहित्य के नेपथ्य में चले जाने या फिर उस इंटरव्यू में त्रिपाठी जी की कृति ‘व्योमकेश दरवेश’ की तथ्यात्मक गलतियों पर सार्थक चर्चा होते होते रह गई. एक साहित्यकार की टिप्पणी थी कि किताब की कमजोरियों से ध्यान हटाने के लिए यह सारा प्रपंच रचा गया. किसी भी कृति में अगर कोई कमजोरी है, तो उसपर किसी भी कालखंड में बात हो सकती है. वह कृति चाहे कितनी भी चर्चित क्यों ना रही हो, कितनी भी पुरस्कृत रही हो, जब भी नए तथ्य सामने आएंगे, तो उसपर बात होनी चाहिए और साहित्य जगत में ऐसा होता भी रहा है. तो व्योमकेश दरवेश को इससे अलग क्यों रखा जाना चाहिए. वह कोई पवित्र ग्रंथ या किताब तो है नहीं कि उसपर सवाल उठानेवाले ईशनिंदा के दोषी करार दे दिए जाएंगें.

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कथाकार प्रभात रंजन ने ‘पाखी’ में प्रकाशित विश्वनाथ त्रिपाठी की बातचीत में तथ्यात्मक गलतियों को छोटी मोटी गलतियां करार दिया, लेकिन इस क्रम में उन्होंने उस पुस्तक की एक बड़ी गलती की ओर इशारा कर दिया. उन्होंने सवाल उठाया कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ज्योतिष विद्या में प्रवीण थे, लेकिन उक्त पुस्तक में त्रिपाठी ने उसपर नहीं लिखा है. प्रभात रंजन का आरोप था कि अल्पना मिश्र ने भी इस बिंदु पर त्रिपाठी को क्यों नहीं घेरा. दरअसल त्रिपाठी जी की इस किताब में इतनी त्रुटियां हैं कि उसके दूसरे संस्करण को ठीक करने के लिए प्रकाशक ने एक अन्य आलोचक को दिया गया. पहले संस्करण और दूसरे संस्करण में कई चीजें बदली गईं.

इस स्तंभ में उसपर पहले भी चर्चा हो चुकी है. दरअसल त्रिपाठी जी ने जिस अभिनंदन ग्रंथ के हवाले से इस किताब में तथ्यों को लिया, वो त्रुटिपूर्ण था और उसको ही आधार बनाकर गुरु आख्यान रच दिया. ऐसा प्रतीत होता है कि विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ का गहनता से अध्ययन नहीं किया. वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह और गौरव अवस्थी के अथक प्रयास के बाद 83 साल बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ का पुनर्प्रकाशन हो पाया था. इसको ही ढंग से देख लेते.

इस किताब को बचाने के लिए जिस तरह से विश्वविद्यालय शिक्षक एकजुट हुए उसको देखते हुए एक साहित्यकार ने इसकी तुलना आरुषि हत्याकांड के दौरान सीबीआई के एक पूर्व निदेशक के बयान से की, जो उस वक्त के अखबारों में सूत्रों के हवाले से छपा था. सीबीआई के निदेशक के हवाले से उस वक्त ये कहा गया था कि इस केस में उनको पिता नाम की संस्था को बचाना था (वी हैव टू सेव द इंस्टीट्यूशन ऑफ फादर).

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उनका मानना है कि व्योमकेश दरवेश को लेकर जिस तरह की एकजुटता दिखी, उसे देखकर कहा जा सकता है कि शिक्षकों की संस्था को बचाना उद्देश्य हो सकता है. (वी हैव टू सेव द इंस्टीट्यूशन ऑफ द टीचर- क्रिटिक). कुछ विद्वान आलोचकों की राय है कि ‘व्योमकेश दरवेश’ जीवनी नहीं, बल्कि संस्मरण है. चलिए अगर यह मान लिया जाए कि वो संस्मरण है, तो क्या संस्मरणों में ताजमहल को दिल्ली में दिखाने की छूट लेखक को दी जा सकती है. क्या रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर लाल किला को पटना में दिखाया जा सकता है.

दरअसल, इस पूरे विवाद की जड़ में ‘पाखी’ पत्रिका में विश्वनाथ त्रिपाठी की एक टिप्पणी थी, जिसको लेकर घमासान मचा. पहले त्रिपाठी जी की लानत-मलामत शुरू हो गई, क्योंकि प्रकाशित टिप्पणी में आपत्तिजनक बातें थीं. बाद में बहस इस दिशा में मुड़ गई कि साक्षात्कार प्रकाशित होने के पहले त्रिपाठी जी को दिखाया जाना चाहिए. अभिव्यक्ति की आजादी के कई पैरोकार, जो सुबह शाम इसको लेकर छाती कूटते हैं, वो चाहे अनचाहे प्री सेंसरशिप की वकालत करने लगे.

पत्रकारों को ये राय दी जाने लगी कि इंटरव्यू छपने के पहले दिखा लेना चाहिए. इंटरव्यू छपने के पहले क्यों दिखा लेना चाहिए? अगर आज यही मांग प्रधानमंत्री या अन्य मंत्रियों की तरफ से आए तो एकदम से इसी फेसबुक बवाल मच जाएगा, ऐसा लगेगा कि इमरजेंसी से बुरे दिन आ गए. इंटरव्यू लेने वाले और इंटरव्यू देनेवालों दोनों को यह पता होता है कि वो क्या पूछ रहे हैं और क्या बोल रहे हैं. कई बार जब मनमाफिक नहीं छपता है या उसपर विवाद हो जाता है, तो लोग अपनी सुविधानुसार मीडिया पर अपने बयान को तोड़-मरोड़कर छापने का आरोप लगा देते हैं. लेकिन उनको भी पता होता है कि जन्नत की हकीकत क्या है.

प्रेम भारद्वाज ने अंतत: विश्वनाथ त्रिपाठी से मिलकर इस पूरे प्रकरण पर खेद जता दिया, लेकिन उन्होंने कुछ सवाल भी खड़े किए हैं. ‘पाखी बनाम आदमीनामा’ शीर्षक से प्रेम भारद्वाज ने एक लंबी पोस्ट लिखी है और कुछ सवाल उठाए हैं- ‘आदमी का जवाब आदमी होना चाहिए भीड़ नहीं. आलोचना और हत्या में फ़र्क होना चाहिए. आखिर वह कौन सा माइंडसेट है, जो आदमी को आदमी नहीं रहने देता, उसके भीतर की हिंसा को बार-बार उभार देता है? वह कौन सी प्रवृत्ति है, जो हर अच्छी-बुरी घटना में साजिश, मकसद और गणित ढूंढ़ती है? वह कौन सी सोच है, जो हमें आदमी से जज बना देती है और कबीलाई मानसिकता की ओर धकेलती है- कभी गाय, कभी मांस का टुकड़ा, ‘कभी एक विवाद’ के बहाने हमला बोला जाता है?

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यही वह पल होता है जब आदमी विवेकशील व्यक्ति से विवेकहीन भीड़ के रूप में तब्दील हो जाता है. ऐसी भीड़ आपके साथ कुछ भी कर सकती है. कुछ दिन हुए जब नामवर सिंह द्वारा भगवान कहे जाने के अपराध में उनके प्रति गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया गया. वह भी त्रिपाठी जी के गुरु और उम्र में उनसे भी बड़े, 93 साल के हैं. फिर वह कौन सी प्रवृत्ति थी, जिसने उनकी उम्र और उनके काम को नज़रअंदाज़ कर उनके साथ सड़कछाप जेबकतरे को पकड़कर सजा देने जैसा व्यवहार किया? उसके भी पहले मैनेजर पांडेय की एक तस्वीर लगती है, तब उनके प्रति अपमान का ज़हर उगलने के पीछे कौन सी प्रवृत्ति काम कर रही थी?’

अब समय आ गया है, जब हिंदी साहित्य से जुड़े लोगों को गंभीरता से इस पर विचार करने की आवश्यकता है कि फेसबुक पर जिस तरह से ‘लिटरेरी लिंचिंग’ को अंजाम दिया जाता है, उसको रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए. क्योंकि जब साहित्यकार के खोल में बैठे गिरोहबाज भाषा की मर्यादा को भूलकर साहित्यिक विमर्श को व्यक्तिगत कर देते हैं और चरित्रहनन से लेकर उसमें परिवार तक को शामिल करने का कुचक्र रचते हैं.

इस प्रवृत्ति को तत्काल रोका जाना जरूरी है. स्वस्थ साहित्यिक विवाद का हमेशा स्वागत होना चाहिए, लेकिन स्वस्थ विवाद के लिए स्वस्थ मानसिकता का होना भी आवश्यक है.

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