fbpx
Now Reading:
इस संसार में ऐसे असंख्य लोग हैं, जो किसी गुरु को नहीं मानते
Full Article 3 minutes read

इस संसार में ऐसे असंख्य लोग हैं, जो किसी गुरु को नहीं मानते

saiगुरु-कृपा पानेवाले का धर्म

सद्गुरु जब कृपा करते हैं, तो कृपा पाने वाले का क्या धर्म होना चाहिए?

सद्गुरु ़फकीर होते हैं अर्थात जो सब कुछ त्यागकर ईश्वर से लौ लगाए रहते हें. जब वे किसी पर कृपा करते हैं तो बदले में अपने लिये कुछ भी आशा नहीं करते. कोई भाषा-विलास, भाव-विलास या युक्ति- विलास से उन्हें प्रसन्न करना चाहे तो यह कभी न होगा. ़फकीर स़िर्फ भक्ति के वश में हैं-

फकीर मेरा दीन-दयाला सब कुछ देता जाए,

ना कुछ मांगे ना कुछ बोले कृपा बरसाता जाए.

लेकिन एक बात निश्चित है कि जो प्राणी फकीर की कृपा से प्राप्त धन, समय एवं शक्ति का अपव्यय या दुरुपयोग करेगा, उसे उसका भुगतान अवश्य करना पड़ेगा. अतः सद्गुरु की कृपा से जो प्राप्त हो, कल्याणकारी कार्यों के लिए उसका सदुपयोग करना चाहिए.

सर्वत्र गुरु-कृपा

इस संसार में ऐसे असंख्य लोग हैं, जो किसी गुरु को नहीं मानते और न ही वे गुरु की महानता पर ध्यान देते हैं, जो क्या इसका मतलब यह समझा जाए कि गुरु उन्हें अपनी ओर आकर्षित नहीं कर रहे? नहीं, ऐसी बात नहीं है. वस्तुतः सद्गुरु के माध्यम से ईश्वर की कृपा-शक्ति सूर्य किरण की तरह चारों ओर फैली हुई है. सूर्य-किरण की प्रतिक्रिया सजीव प्राणी और पेड़ आदि पर भी है तथा निर्जीव पत्थर, नालों आदि पर भी है. उसी प्रकार सद्गुरु की कृपा-शक्ति भी विश्व भर में फैली हुई है. कोई विश्वास करे या न करे इससे कुछ अंतर नहीं पड़ता. गुरु-शक्ति को न मानने वाले व्यक्ति भी अपना नियत समय आने पर उस ओर चल देते हैं.

गुरु की अलौकिक कार्य-प्रणाली

यह कहा जाता है कि गुरु सुक्ष्म रूप से भी कार्य करते हैं. प्राणियों की आध्यात्मिक चेतना के विकास की दिशा में गुरु की सूक्ष्म शक्ति किस रूप में कार्य करती है?

गुरु की सूक्ष्म शक्ति इतने रूपों में कार्य करती है कि उसे समझ पाना आसान नहीं है. संक्षेप में यदि कहा जाए तो उस कार्य-विधि के विभिन्न स्तर या अवस्थाएं हैं. सर्वप्रथम गुरु अपनी ओर जीव को आकर्षित करते हैं. इस स्थिति में प्राणी उनके प्रभामंडल के घेरे में आता है. गुरु की आकर्षण-शक्ति का प्रभाव उसके अंतःस्थल को एक भाव-तरंग के रूप में छूता है, जिससे वह अभिभूत हो जाता है. इसको सालोक्य कहते हैं. उसी के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे व्यक्ति के हृदय में शुद्धता आने लगती है. शुद्धता के प्रयास-शुद्धता से वह क्रमशः गुरु के समीप आने लगता है. उसी को समीप्य कहते हैं. फिर धीरे-धीरे गुरु की आंतरिक शक्ति शिष्य के भीतर आने से उसके रूप, भंगिमा, हाव-भाव, मुद्रा आदि में समानता आने लगती है. इसको सारूप्य कहते हैं. फिर होती है सौष्ट्रीय, जिसका अर्थ है कि इस अवस्था में गुरु की सूक्ष्म शक्ति शिष्य के माध्यम से कार्य करने लगती है. अंत में जब शिष्य संपूर्ण रूप से गुरु में समा जाता है, तो उसकी स्वतंत्र सत्ता नहीं रह जाती और वे एक हो जाते हैं. इसे सायुज्य कहते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.