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आध्यात्मिक पथ पर प्रगति
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आध्यात्मिक पथ पर प्रगति

shirdi-saibaba-EF99_lसदगुरु ने जब भी जब भी किसी की मदद की, अकस्मता की. जब वे यह देखते हैं कि व्यक्ति अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपने को अच्छा या निर्मल बनाने का प्रयत्न कर रहा है, पर ऐसा नहीं कर पा रहा है, तो वे उसकी सहायता करते हैं. जैसे श्री उपासनी बाबा-जिनके विषय में श्री साई बाबा के पास आए थे तो बहुत कुछ वे स्वयं करके आए थे. बाबा के पास आने के अनेक वर्ष पूर्व बहुत कम आयु में उन्होंने पूरे एक साल बिना भोजन किए साधना की थी और शरीर और मृत्यु के रहस्य को समझने का प्रयत्न किया था. वे एक ऐसी गुफा में जाकर रहे थे जहां पीना भी उपलब्ध नहीं था. उन्होंने अपने शरीर को कष्ट दिया. मान-अपमान सहा. घर-परिवार सबको छोड़कर चार वर्षों तक खंडोबा मंदिर में रहे थे. कहने का मतलब यह है कि जिसने भी पाया, उसने पहले स्वयं प्रयत्न किया, उसके लिए कष्ट सहा और त्याग किया, तब जाकर वे सदगुरु की कृपा के पात्र बने.

बाबा ने कहा था कि पहले मन के छोट-छोटे बन्धनों से तो निकलो. वे जानते थे कि अधिकांश लोग आध्यात्मिक चेतना के निम्न स्तर पर हैं. इसीलिए पहले उन्होंने दक्षिणा मंाग-मांग कर रुपये पैसे के मोह से निकलने की बात सिखाई. वे चाहते थे कि लोग पहले इसकी मााय से तो निकलें. जब काका साहेब दीक्षित ने सब कुछ छोड़ा, तब जाकर उन्हें सब कुछ मिला.
आंतरिक पूजा
क्या औपाचारिक रूप से पूजा-पाठ आदि करना ही आध्यात्मिकता है?
हां भी और नहीं भी. चेतना के विभिन्न स्तर पर लोग विभिन्न प्रकार की पूजा-परिपाटी करते हैं. एक आदमी सोना, रूपया, फल आदि समस्त वस्तुएं चढ़ाकर किसी देव की पूजा कर सकता है और एक गरीब व्यक्ति तुलसी अक्षत फल और दूर्वा के साथ पूजा करता है. श्री कृष्ण ने गीता में यह कहा है कि अगर भाव पूरा हो, चाहे पूजा सरल हो, तो वह ईश्वर द्वारा ग्राह्य है. ईश्वर के प्रति ज्यादा वस्तुएं अर्पित करने के उपरांत भी भाव न हो तो पूजा पूर्ण नहीं होती. कई लोग तो इस प्रकार की पूजा न करके अंतर्मन में पूजा करते हैं. बाबा ने कहा है कि आंतरिक पूजा अर्थात भाव पूजा ही श्रेष्ठ है. अन्ततोगत्वा जिसके भाव शुद्ध एवं एकाग्र और चेतना शुद्ध है, तो वह चाहे किसी भी प्रकार की पूजा करे, वह ईश्वर द्वारा ग्राह्य है. यही वास्तव में आध्यात्मिकता का रास्ता है. यदि केवल भौतिक आवश्कताओं की पूर्ति के लिए ईश्वर की पूजा की जाती है, तो वह आध्यात्मिक नहीं है. वह सकाम पूजा है, जब कि ईश्वर निष्काम पूजा से संतुष्ट होते हैं. जो भी कुछ हमारे प्रारब्ध के कारण जीवन में घटित होता है. क्या हमने उसे सवीकार किया-चाहे वह दुख अथवा सुख हो. क्या हम ईश्वर की कृपा पाने के लिए योग्य बन पाए? अपने विषय में न सोचकर क्या दूसरों के हित के लिए कुछ कर पाए? जब तक ऐसा करने की शक्ति अपने में जागृत न कर पाएं, तब तक आध्यात्मिक मार्ग पर चलना संभव नहीं है.
बंधन मुक्ति
कोई प्राणी जीवात्मा से शिवात्मा कैसे बनता है?
जब कोई प्राणी निष्पृह होकर अर्थात कामना रहित होकर, संसार में रहकर भी सांसारिक आर्कषणों के प्रति विरक्त रहकर, किसी के लिए कुछ करने पर बदले में बिना कुछ चाहे करुणावश समाज के लिए त्याग करना शुरू करता है तो उसकी आत्मा क्रमश: महात्मा स्वरूप को धारण करने लगती है. फिर वह जीवात्म के बंधन में नहीं रहता. वह शिवात्मा बनता है, जो कि सर्वव्यापक, शांत और अद्वैत रूप है. शिवं शांतं अद्वैतम्‌लेकिन यह एकाएक नहीं होता. कठोर साधना के बाद ही ऐसा भाव उत्पन्न होता है.
अध्यात्म मार्ग : दु:ख से निवृत्ति
बहुत सी पुस्तकों में ऐसा कहा गया है कि जो अध्यात्म-मार्ग पर चलेगा वह बहुत कठिनाई पाएगा. क्या यह बात सही है?
आध्यात्मिक जगत में जो जाएगा, उसे भौतिक दुनिया की विचारधारा और प्रणाली से अलग होना पड़ेगा, जो कि समाज में रहते हुए आसना नहीं है. जैस कि लोभी व्यक्ति से यह कहा जाए कि वह अफनी कमाई का पच्चीस प्रतिशत ईश्वर या गरीबों के लिए दान करे, तो वह अनुभव करेगा कि उस पर अत्यंत संकट का पहाड़ टूट पड़ा है. लेकिन उसका विश्वास पक्का है, तो वह ऐसा कर भी देगा. आगे चलकर त्याग करते समय उसे कष्ट नहीं होगा, जो यह कहा जाता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का अन्य अर्थ दु:ख-यात्रा को झेलना है, तो यह बात सम्पूर्ण रूप से निराधार है. जो व्यक्ति विचार या मोह आदि बंधन में बंधा हुआ है , वस्तुत: उसी को कष्ट होता है. सत्यता तो यह है कि व्यक्ति धीरे-धीरे जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाएगा, तो उसके दु:ख का अनुभव भी क्रमश: खत्म होता जाएगा. इस मार्ग पर तो वह बंधन ही हट जाता है और व्यक्ति हल्का हो जाता है. फिर दु:ख को अनुभव करने का प्रश्न ही नहीं उठता. यदि उसका दु:ख बढ़ रहा है तो इसका मतलब यह है कि आध्यात्मिक मार्ग पर न चलकर वह उसकी उल्टी दिशा में चल रहा है.
लोग संतों के जीवन में बाह्य रूप से दिखने वाले कष्ट एवं कठिनाइयां देखते हैं और उन पर दया भी करते हैं. संत जन तो बन्धन मुक्त हैं और वे सदैव अखंड आनंद की स्थिति में रहते हैं. उनको सामान्य आदमी जैसे दु:ख या सुख का अनुभव नहीं होता, क्योंकि वे अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियों पर सम्पूर्ण नियंत्रण पा चुके हैं.

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