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आध्यात्मिक या धार्मिक गुरु के शिष्यत्व का संबंध
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आध्यात्मिक या धार्मिक गुरु के शिष्यत्व का संबंध

saiगुरु का संरक्षण

गुरु मार्ग पर चलते हुए गलतियां जरूर करेंगे, तो श्री गुरु को इस बात से कब और कैसे अवगत कराएं?

मनुष्य से गलतियां होती ही हैं. सद्गुरु को विदित है कि माया के खेल में उनका शिष्य गलती करेगा ही. सद्गुरु सचेत रहते हैं कि उसे गलतियां करने से रोकें. अपनी गलतियों के कारण यदि शिष्य संकट में भी पड़ जाए तो सद्गुरु प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसकी सहायता अवश्य करते हैं. बाबा कहते थे- यह तुम जानो कि जहां भी तुम जो भी करते हो मुझे जानकारी है. उनके जीवन से पता चलता है कि वे सर्वज्ञाता थे. गुरु जानते हैं कि अपने किस शिष्य को कैसे आगे बढ़ाना है और किसे गलतियां करने से कैसे रोकना है. अनजाने में की गई गलतियों के लिए हमें गुरु का संरक्षण अवश्य मिलेगा परन्तु हमें प्रयास करना चाहिए कि जानबूझ कर की गई गलतियों की पुनरावृत्ति न हो. कभी-कभी गुरु के मार्ग का अनुसरण करने में सफल नहीं हो पाते. गुरु इस बात का बुरा नहीं मानते. वे तो केवल शिष्य की गुरु-मार्ग पर आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति की प्रबलता को परखते हैं. यदि इच्छा प्रबल है और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव है, तो गलतियां होने पर भी वे शिष्य को गुरु-मार्ग पर अपने साथ रखते हैं.

गुरु के प्रति पूर्ण विश्वास एवं निर्देशों का पालन

एक शिष्य के रूप में विकसित होने के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए और उसे कैसे अर्जित किया जाए?

सभी व्यक्तियों में एक गुरु एवं साथ ही साथ एक शिष्य बनने के गुण अन्तर्निहित होते हैं. बचपन में माता-पिता बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करते हैं, जो कि उनको विकसित करने के लिए आवश्यक होती है. जब वे कुछ बड़े होते हैं, तो स्कूल एवं कॉलेज जाते हैं और अपने अध्यापकों से औपचारिक शिक्षा प्राप्त करते हैं. सामान्य जीवन में भी व्यक्ति जाने-अनजाने किसी न किसी से कितनी ही बातें सीखता है. जहां तक आध्यात्मिक या धार्मिक गुरु के शिष्यत्व का संबंध है, इसके लिए कुछ विशेष आचार एवं नियमों का पालन करना आवश्यक है. शिष्य बनने के लिए पहली आवश्यक योग्यता है- गुरु के प्रति सम्पूर्ण विश्वास अर्थात यह कि शिष्य के लिए गुरु जो भी कर रहे हैं, वह शिष्य के हित में होगा. दूसरी बात यह है कि गुरु जो भी कहें, उनके दिशा-निर्देशों एवं उनकी भावनाओं का आदर करना चाहिए और जहां तक हो सके यथाशक्ति उनका पालन करना चाहिए. उदाहरण के लिए यदि गुरु कहते हैं कि दयालु बनो और गरीबों को भोजन कराओ, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार यह कार्य करना चाहिए. यदि सद्गुरु के निर्देशों का पालन करने में उसके समक्ष कोई कठिनाई आती है, तो उसे अपने गुरु को उस संबंध में बता देना चाहिए. असली गुरु सदैव परिस्थितियों के अनुरूप उस समस्या का सरल समाधान करेंगे. गुरु एक ऐसा रास्ता सुझाएंगे जो कि इस जटिल संसार में उपयुक्त और आसान होगा. जहां गुरु देह-रूप में नहीं है, जैसे कि श्रीसाईं, उस संबंध में उनके द्वारा प्रदान की गई शिक्षाओं को समझ कर उत्तर पाने का प्रयत्न करना चाहिए. इसीलिए श्री साईं सच्चरित्र का नियमित पारायण करने के लिए कहा गया है.

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