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सबूरी को मन में कैसे बसाए रखें
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सबूरी को मन में कैसे बसाए रखें

गुरु के प्रति आस्था हर परिस्थिति में बनाए रखना ही एक मात्र मार्ग है, उन लोगों के लिए जो उनके समीप आना चाहते हैं. पर कुछ लोग जो सांसारिक वस्तुओं को पाने की इच्छा से सद्गुरु के पास आते हैं या इस आशा को मन में रखकर भक्ति का प्रदर्शन करते हैं, कभी न कभी अपनी इच्छा-पूर्ति न होने पर या अपने कर्मफल भोगने के समय विश्वास खो देते हैं. किसी भी अवतार या सद्गुरु के समय में हर व्यक्ति की हर इच्छा पूरी नहीं हुई.

saiiiiiiiiसबूरी रखना कठिन है. फिर भी अपने जीवनकाल में हर इंसान कभी न कभी सबूरी अवश्य रखता है. प्रश्न तो सबूरी के स्तर का है. सबूरी की शक्ति को स्वयं ही बढ़ाना पड़ता है, जिससे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी इंसान की सहनशीलता बढ़ सके. जब इंसान का अहंकार घटता है, तो सबूरी बढ़ती है, क्योंकि इंसान जीवन के हर पहलू को अहंकार से जोड़कर लेता है और इसलिए अधीर हो जाता है. इंसान जो कुछ भी कर रहा है, उसका कारक नहीं है और न ही वह उसके अंतिम परिणाम को नियंत्रित कर सकता है. सब कुछ किसी ईश्वरीय शक्ति, किसी सद्गुरु द्वारा संचालित होता है, इसका बोध होने पर इंसान कठिन क्षणों में प्रतिक्रियात्मक न होकर धीरे-धीरे सहनशीलता बनता जाएगा. सहनशीलता बढ़ाने के लिए सदैव गुरु के वचन याद रखने चाहिए तथा कठिनाई के क्षणों में गुरु को याद करना चाहिए.
श्रद्धा
श्रद्धा की ज्योति आत्मा में कैसे जगाए रखें?
श्रद्धा की ज्योति सदैव आत्मा में प्रज्वलित रहती है, परन्तु उस पर माया का परदा पड़ा रहता है. ज्योति तो प्रज्वलित है ही, प्रश्न उठता है-परदा हटाने का. परदा हटाने के लिए मन को गुरु के प्रति केन्द्रित करें. आत्मा गुरु के प्रति समर्पित हो तो हर समय गुरु के विषय में ही सोचेगी और सदैव ही हर कर्म में गुरु की महानता, विशालता एवं कृपा का अनुभव होगा. इसी अनुभव के सहारे धीरे-धीरे स्वयं ही माया का परदा हटता जाएगा और श्रद्धा की ज्योति अवश्य प्रज्वलित होगी.

विश्वास और तार्किक बुद्धि
अध्यात्म में प्राय: दृढ़ निष्ठा या विश्वास एवं तार्किक बुद्धि की अलग-अलग दिशाएं निर्धारित की गई हैं. आपकी इस संबंध में क्या मान्यता है?
reasoning का मूल अर्थ तर्क, युक्ति या विचारणा मात्र नहीं है. उसका वास्तविक अर्थ है-किसी भी घटना या स्थिति के कारण को समंजित रूप में समझने का प्रयत्न करना. अर्थात हमारे भीतर, आस-पास या व्यापक रूप में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह क्यों हो रहा है, इसे तत्त्वत: जानने का प्रयत्न करना. मेरी दृष्टि में इसी समझ का चरम रूप दृढ़ निष्ठा या विश्वास है. दृढ़ निष्ठा-भाव या विश्वास इस समझ के बिना कायम नहीं रह सकता और बिना दृढ़ निष्ठा या विश्वास के यह समझ नहीं हो सकती. अत: ये दोनों वस्तुत: एक-दूसरे पर आश्रित हैं.
हमारा विश्वास एक हवा का झोंका आने पर अविश्वास में बदल जाता है. इसको हम कैसे रोक पाएं?
गुरु के प्रति आस्था हर परिस्थिति में बनाए रखना ही एक मात्र मार्ग है, उन लोगों के लिए जो उनके समीप आना चाहते हैं. पर कुछ लोग जो सांसारिक वस्तुओं को पाने की इच्छा से सद्गुरु के पास आते हैं या इस आशा को मन में रखकर भक्ति का प्रदर्शन करते हैं, कभी न कभी अपनी इच्छा-पूर्ति न होने पर या अपने कर्मफल भोगने के समय विश्वास खो देते हैं. किसी भी अवतार या सद्गुरु के समय में हर व्यक्ति की हर इच्छा पूरी नहीं हुई. सद्गुरु उन इच्छाओं को कभी पूर्ण नहीं करते, जो उन्हें ईश्वर के समीप लाने के लिए बाधक होंगी. इस इच्छापूर्ति न करने के पीछे उनका ही हाथ रहता है. इसलिए जो व्यक्ति सुख और दु:ख दोनों में बाबा को देख सकता है, वह बाबा का असली भक्त होगा.
समर्पण क्या होता है
समर्पण का अर्थ होता है-सम रूप में अर्पण. हम ईश्वर को समरूप से जितना अर्पण करेंगे, ईश्वर भी उसी के अनुरूप देंगे. इस प्रकार इसका तात्पर्य है-ईश्वर अथवा गुरु के प्रति समान रूप से अर्पणता और यह अर्पण भावात्मक है. भावात्मक समर्पण का अर्थ यह है कि जब हमारे गुरु सब कष्टों को दूर करने का प्रयास करते-करते भी शुद्ध भाव अर्पण करने का प्रयास करते हैं, तो क्या हम गुरु कार्य करते-करते सब कुछ सहते हुए भी शुद्ध भाव अर्पित करते हैं? ईश्वर शुद्ध भाव देते हैं और शुद्ध भाव चाहते हैं. यदि वह नहीं है तो वह प्राथना है-कुछ मांगों की पुर्ति के लिए बाबा की आरती में है.
जया मनी जैसा भाव.
तया तैसा अनुभव.
जिसके मन में जैसा भाव होता है, उसको उसी के अनुरूप अनुभव होता है. जिन भावनाओं से उन्हें अर्पण किया जाए, उसी शुद्धता से उनको ग्रहण किया भी किया जाए. कुछ लोग समझते हैं कि नारियल, कपड़ा आदि चढ़ाना भी भावार्पण है, ऐसा नहीं है. क्योंकि गुरु उसे नहीं बल्कि जिस भाव से दिया गया है, उसे ग्रहण करते हैं. यदि प्रयास करते हुए भाव बिगड़ गया तो वह अग्राह्य हो जाता है.

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