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सद्गुरु भक्तों के अर्न्तमन को जानते हैं
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सद्गुरु भक्तों के अर्न्तमन को जानते हैं

sai-baba-hd-in-satishverma-गुरु-मुख होने की आवश्कता संसार में जो अनेक तरह के बंधन हैं, मनुष्य उनमें क्यों फंसता है?

संसार के अनेक बंधनों में हम इसलिए फंसते हैं, क्योंकि हमारे मन में संसार के प्रति आकर्षण होता है. हम उस भावना के अनुरूप चलना चाहते हैं, जो मन के अनुकूल लगती है. जो कुछ भी मन के उनकूल नहीं लगता, उससे हम क्षुब्ध हो जाते हैं. यदि हमने प्रतिकूलता में भी अपने को साध लिया, तो अनुकूल के बंधन में भी नहीं बधेंगे. जो प्रतिकूल या अनुकूल दोनों के बंधन में नहीं आते हैं, उनको स्थित प्रज्ञ कहते हैं. मन अपने को सही ठहराने के लिए बेहया वृत्ति अपनाता है, किसी भी तरह से अपनी ओ खींचेगा. छोटी-छोटी चीजों में हम स्वयं फंसते हैं, अत: उनमें से स्वयं ही निकलना होगा. खुद ही निर्णय करना पड़ेगा कि हमको मन-मुख होना है या गुरु-मुख. इेकिन इतना निश्चित है कि-मन-मुख निकलकर जो होता है गुरु-मुख… … … …संसार उसके लिए असार पर सार केवल गुरु ही हैं.
सामान्य जीवन में समय के बदलाव के कारण व्यक्ति द्वारा आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का कौन सा उपाय है?
साधारण और नित्य एक ही दिनचर्या सा जीवन जीने वाले लोगों के लिए केवल वर्तमान में नहीं बल्कि हर युग में कठिनाई रही है. साधारण जीवन व्यतीत करने का अर्थ है-सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और सास्कृतिक रूप से पीढ़ियों की आध्यात्मिक परंपराओं को लेकर चलना और समय-प्रवाह में उनमें होने वाले परिवर्तनों के साथ अपने को ढालना. जो लोग अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों से अलग होकर केवल आध्यात्मिक मार्ग में ही चलना चाहते हैं, उनके लिए यह मार्ग अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन परिवार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए, सामान्य सांसारिक जीवन जीते हुए इस मार्ग पर चलने में कई बाधाएं उत्पन्न होती हैं. बहुत से सांसारिक भक्त इन समस्याओं से निदान के लिए गुरु भक्ति का मार्ग ढूढ़ रहे हैं. एक बार यदि कोई सच्चे अर्थ में गुरु-मुख होता है, तो उसके लिए सांसारिक कर्तव्यों को निभाते हुए भी आध्यात्मवाद के मार्ग पर चलना आसान हो जाता है. ऐसी परिस्थिति में चेतना के विकास हेतु इस मार्ग में चलने के लिए भक्त की इच्छा-शक्ति, सदगुरु की कृपा एवं दिव्य प्ररेणा अत्यंत आवश्यक है. इस मार्ग पर चलने में शुरू-शुरू में कठिनाई महसूस हो सकती है. इसके लिए कई वर्षों की तैयारी की आवश्यकता होती है. अगर कोई भक्त गुरु की खोज में गुरु के जीवन चरित्र को पढ़े तथा उनका चिंतन करता रहे और धैये धारण करते हुए अपनी चारित्रिक शुद्धता बनाए रखता है, तो धीरे-धीरे सद्गुरु के दिव्य भाव उसके अन्त:करण को प्रभावित करेंगे. यदि विश्वास के साथ वह निरंतर ऐसा करता रहता है, तो एक विहित समय पर उसे गुरु अवश्य मिलेंगे. यह कहना और भी सटीक होगा कि यदि इस प्रकार गुरु की खोज में वह निरंतर लगा रहता है, तो वह गुरु का ध्यान अपनी ओर अवश्य आकर्षित कर लेगा, क्योंकि गुरु में सभी के अवगुणों एवं गुणों को पहचानने की दिव्य क्षमता है और वे सभी भक्तों के अर्न्तमन को जानते हैं. इसीलिए यह कहा गया है कि शिष्य गुरु नहीं ढुढ़ते बल्कि गुरु ही शिष्य को अवश्य ढूंढ़ लेते हैं. जैसा कि बाबा ने कहा था.
मैं अपने भक्त को सात समुद्रों के पार से भी उसी प्रकार खींच लूंगा, जिस प्रकार कि एक चिड़िया को जिसका पैर रस्सी में बंधा हो खींच कर अपने पास लाया जाता है.
हमारे कठिनाइयों और परेशानियों से भरे जीवन में करुणा, क्षमा और नि:स्वार्थ-सेवा के गुण को विकसित करने के लिए बहुत साधना/प्रयत्न की आवश्यकता है. करुणा एवं नि:स्वार्थ सेवा सद्गुरु के लक्ष्य हैं. इसका र्म यह है कि दीन-दुखियों एवं अन्य प्राणियों की अपनी सामर्थ्य के अनुसार सेवा करते हुए गुरु के आदेशों का पालन और उनकी शिक्षाओं के अनुसार आचरण करने से ही इस मार्ग पर चलने की शुरूआत करनी चाहिए. फिर धीरे-धीरे और कठिन प्रयास करते हुए इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए. जिंदगी की मुसीबतों को झेलते हुए अपनी कोशिशों से व्यक्ति अपने जीवन में जो भी गुण विकसित करता है, वे उसमें स्थायी रूप से घर कर लेते हैं और फिर वे गुण उसकी आत्मा का एक अंश बन जाते हैं. वही गुण उसके साथ जन्म-जन्मान्तर तक चलते हैं. आध्यात्मिक मार्ग में और विकसित होने के लिए वह अगले जन्मों में भी पुन: गुरु की सहायता प्राप्त करता है.

चेतना के विकास का संक्षिप्त मार्ग

हर व्यक्ति की अपनी सीमाएं होती हैं और वह अपने सीमित रूप में ही सब कुछ सोचने-समझने के लिए मजबूर है. उसे उसके सीमित दायरे से निकालने का सहज उपाय क्या है?
हर प्राणी की चेतना के विकास की अपनी एक ऐसी स्थिति होती है. सृष्टि के विकास की यही कहानी है. असंख्य योनियों को पाक करके वह मानव बना है. इसके लिए भी न जाने उसे कितने प्रकार की स्थितियों से गुजरना पड़ा है. उस की सोच समझ अपनी स्थिति के ही अनुरुप है. श्वान (कुत्ते) के समक्ष चाहे कितनी ही रंगीन रोशनी क्यों न हो उसमें रंग को पहचानने की क्षमता नहीं है. केवल सदगुरु ही प्राणी को एक स्थिति से निकालकर चेतना की दूसरी स्थिति में ले जाने में सक्षम हैं. मनुष्य की सबसे बडी दुर्बलता यह है कि उसका मन अत्यंत चंचल है तथा तर्क-वितर्क-कुतर्क के कारण उसमें अस्थिरता बनी रहती है और वह अपने मूल लक्ष्यों से भटक जाता हैं. एक ही स्थिर बिंदु पर ध्यान केंद्रित रहे तो वहीं से संपूर्ण जगत दिखाई देगा, उसे इधर-उधर जाने की आवश्यकता नहीं है. दो बिंदोओं को मिलाने वाली सबसे छोटी रेखा केवल आवश्यकता नहीं है. दो बिंदुओं को मिलाने वाली सबसे छोटी रेखा केवल ऋजु (सरल रेखा) है.
वह सरल रेखा है- गुरू का अनुसरण करना.

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