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साई बाबा : जैसा भाव वैसा गुरु
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साई बाबा : जैसा भाव वैसा गुरु

sai baba

sai babaअपने सांसारिक ज्ञान के आधार पर आध्यात्मिक कार्य की विवेचना करना मनुष्य की एक बहुत बड़ी कमी है. आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के बाद संासारिक ज्ञान का लोक-कल्याण के लिए ज्यादा उपयोग किया जा सकता है. अपर पक्ष में सांसारिक धर्म के नियमों का पालन करने से कोई आध्यात्मिक ज्ञान या स्थिति को प्राप्त करेगा- यह प्रायः संभव नहीं है. हालांकि दोनों मार्ग ईश्वर द्वारा बनाए गए हैं, किंतु सांसारिक मार्ग स्थूल और कुटिल मार्ग है तथा आध्यात्मिक मार्ग अत्यंत सूक्ष्म और दिव्य मार्ग है.

आम आदमी अपनी इच्छा-शक्ति के प्रयोग से सांसारिक कार्य को संपूर्ण रूप से त्याग कर आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए सक्षम नहीं है. यह रास्ता तो केवल गृह-त्यागी संत-साधु एवं जोगियों के लिए है. संत-साधु एवं सन्यासी के रूप में घूमने वाले परान्नोपजीवी (जो दूसरों के दिए हुए अन्न पर निर्भर करते हैं), कपटी और निठल्लों के दिखावे को आधार मानकर शुद्ध आध्यात्मिक-मार्ग का आकलन करना समीचीन नहीं है. फिर भी ज्यादातर लोग प्रायः इस प्रकार के दिखावे और बातों से मुग्ध होकर उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं.

चूंकि ज्यादातर लोगों का संसार के जंजालों से घिरा हुआ मन अशुद्ध होता है, इसलिए अपने स्वभाव के कारण अन्य अशुद्ध प्राणी-जैसे कि कपटी संन्यासी आदि किसी अन्य की ओर उनका आकृष्ट होना स्वाभाविक है. जिन लोगों के मन में शुद्धता होती है, वे स्वाभाविक रूप से सच्चे संत और संन्यासी की ओर आकर्षित होते हैं. इससे यह पता चलता है कि हर भक्त अपनी इच्छा के अनुरूप व्यक्ति को गुरु मानने को तैयार है और वह भावात्मक एवं सीमित बुद्धि से उनका आकलन करता है.

इससे यह भी प्रमाणित होता है कि जैसा मन वैसा गुरु. जिस व्यक्ति की दृष्टि शुभ हो, उसको हर चीज में शुभत्व दिखाई देगा और जिसकी दृष्टि अशुभ हो, उसे अशुभ दिखाई देगा. आम व्यक्ति क्यों, बड़े-बड़े संत और ज्ञानी भी शुभ और अशुभ दोनों गुणों से बने हुए हैं. पर यह कहा जा सकता है कि जिसके ज्यादातर गुण शुभ होते हैं और जन-कल्याण में लगते हैं, उनको हम महान्‌ मानते हैं, यद्यपि उनके भी कुछ अवगुण शेष रहते हैं.

लोग उन लोगों को बुरा मानते हैं, जिनके ज्यादातर गुण दूसरों को हानि पहुंचाते हैं, यद्यपि उनमें एक-दो गुण अच्छे हो सकते हैं. जैसे हर भक्त अपने अशुभ गुण को त्याग कर शुभ गुण प्राप्त करने के लिए प्रयास करता है, उसी प्रकाय जोगी और संन्यासी भी अनेक शुभ गुणों से युक्त होकर भी अपने शेष अवगुणों से ऊपर उठने के लिए हर वक्त प्रयत्न करते हैं. इस प्रकार विभिन्न अवस्थाओं में रहने वाले करो़ड़ों-करोड़ों लोग आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं. इस प्रकार की क्रमिक प्रगति करना ही मानव-जन्म का मूल उद्देश्य है.

धर्म-शास्त्र और मनोविज्ञान-शास्त्र, इस सत्यता पर एक मत हैं कि जो जिस प्रकार की भावना को अपने अन्दर पनपाएगा, वह आगे चलकर उसी प्रकार का बनेगा. निंदक, ईर्ष्यालु या अशुभ दृष्टि वाले व्यक्ति दूसरों की बुराई के बारे में सोच-सोचकर मानव-जीवन के अत्यंत मूल्यवान समय को नष्ट करते रहते हैं और अपने मन को कलुषित करते हैं. ऐसे लोगों को दूसरों के अच्छे गुण के स्थान पर केवल अशुभ गुण ही नजर आते हैं. अपर पक्ष में शुभ दृष्टि-संपन्न व्यक्ति हर अशुभता में भी शुभता को देखते हैं और अपने को गिरने नहीं देते. वे स्वभाव से और अनायास रूप से दूसरों की निंदा कर अपने मन को कलुषित नहीं करते हैं

. इस बारे में श्री साईं सच्चरित्र में एक प्रसंग है, जिसमें बाबा ने विष्ठा खाते हुए एक सूअर की ओर इंगित कर एक निंदक से कहा था- देखो वह कितने प्रेमपूर्वक विष्ठा खा रहा है. तुम जी भर कर अपने भाइयों को सदा अपशब्द कहा करते हो और यह तुम्हारा आचरण भी ठीक उसी के समान है. अनेक शुभकर्मों के परिणाम-स्वरूप ही तुम्हें मानव-तन प्राप्त हुआ है और इसीलिए यदि तुमने इसी प्रकार आचरण किया, तो शिरडी तुम्हारी सहायता ही क्या कर सकेगी?

ये बातें इसीलिए महत्त्वपूर्ण हैं कि दुनिया की राह पर द्वंद्व, कपटपूर्ण सांसारिक नियमों से चलने वाले लोग बहुत आसानी से गलत संगत में पड़कर अशुभ दृष्टि वाले निन्दक या ईर्ष्यालु प्राणी बन जाते हैं. इससे और किसी की हानि हो या न हो, पर वह निंदक व्यक्ति जरूर धीरे-धीरे आध्यात्मिक प्रगति के पथ से दूर होता जाता है और उसका नैतिक पतन होता है. अगर मन में इस प्रकार की भावना कभी भी आए, तो तत्काल बाबा की इस कहानी को याद करना चाहिए और उनका नाम-जाप करना चाहिए, ताकि मन की शुद्धता बच सके. रात में सोने से पहले दिन भर सोचे हुए अशुभ या गलत विचारों के बारे में चिंता कर उससे मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए.

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