fbpx
Now Reading:
सद्गुरु तक पहुंचने के लिए निरंतर प्रयास करना ज़रूरी
Full Article 3 minutes read

सद्गुरु तक पहुंचने के लिए निरंतर प्रयास करना ज़रूरी

sai-baba

sai-babaआज के युग में इतने गुरु हैं, तो कैसे पता चले कि हमें सही श्री गुरु मिल गए हैं?

गुरु कई प्रकार के हैं- पिता-माता प्रथम गुरु, शिक्षा गुरु, मंत्र गुरु, कुल गुरु आदि. हर व्यक्ति कहीं न कहीं गुरु खोजने का प्रयास करता है-करना भी चाहिये. गुरु गीता में भी कहा गया है कि जैसे भंवरा फूल से फूल तक जाता है, उसी प्रकार गुरु से गुरु तक जाना चाहिए. पर हर गुरु सद्गुरु नहीं है. सद्गुरु तो वह हैं जो आत्मा को परमात्मा तक पहुंचा सकते हैं और जिनमें हर परिस्थिति में भक्त की रक्षा करने की सामर्थ्य हो. सद्गुरु पृथ्वी पर बहुत कम होते हैं. एक बार सद्गुरु तक पहुंचने के बाद गुरु खोजने की आवश्यकता नहीं रहती. सद्गुरु के पास पहुंचने तक शिष्य ढूंढ़ता रहेगा कि खरा सोना कहां है, क्योंकि इस दुनिया में जैसे सद्गुरु हैं, वैसे ही असद्गुरु भी हैं. यह तो हमें अपनी बुद्धि का प्रयोग करके देखना पड़ेगा कि गुरु सद्गुरु हैं या नहीं. फिर जिसको सद्गुरु तक पहुंचने की इच्छा है, उसे निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए. एक न एक दिन वह सद्गुरु की दृष्टि अपनी ओर आकर्षित कर लेगा. तत्पश्चात्‌ किसी न किसी माध्यम से वह स्वयं ही सद्गुरु तक पहुंच जायेगा.

Read more.. श्री साईं एक दिव्य व्यक्तित्व

गुरु-दीक्षा

क्या गुरु से दीक्षा लेना आवश्यक है?

है. पर दीक्षा का रूप क्या होना चाहिए, इसमें विभिन्नता है. किसी मत के अनुसार गुरु द्वारा कान में मंत्र देना, नाम देना या बीज-अक्षर देना दीक्षा है. किसी पूजा-पाठ या साधना-पद्धति से भी दीक्षा देने की परंपरा है. गुरु तभी दीक्षा देते हैं, जब वे भक्त या शिष्य को भक्ति-मार्ग पर विशेष रूप से लेना चाहते हैं. मैं समझता हूं कि यह भावनात्मक सम्बन्ध है, वह चाहे औपचारिक रूप से हो या अनौपचारिक रूप से. गुरु के प्रति जब श्रद्धा प्रगाढ़ हो जाती है, तब उनका नाम ही दीक्षा-मंत्र हो जाता है.

Read more.. श्री साईं-सच्चरित्र में कर्म-सिद्धांत

गुरु-स्मरण का महत्व

गुरु के स्मरण को इतना महत्व क्यों दिया गया है?

गुरु की आलोक-रश्मि सबमें है. उनका स्मरण करने से व्यक्ति उनके प्रभा-मण्डल से जुड़ता है. उनका स्मरण करते ही वह स्वतः उनकी भाव-तरंग से जुड़ जाता है. गुरु का भाव भक्त को आवेशित करता है और उस समय मन को सांसारिक संकल्प, जो कि चित्त को अस्थिर करते हैं, नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि गुरु का प्रभा-मण्डल बहुत शक्तिशाली होता है. बाबा ने कहा था कि-

  •  …जो कोई अनन्य भाव से मेरी शरण आता है, जो श्रद्धा पूर्वक मेरा पूजन, निरन्तर स्मरण और मेरा ही ध्यान करता है, उसको मैं मुक्ति प्रदान कर देता हूं.
  •  जो नित्य प्रति मेरा नाम स्मरण और पूजन कर मेरी कथाओं और लीलाओं का प्रेमपूर्वक मनन करते हैं, ऐसे भक्तों में सांसारिक वासनाएं और अज्ञान-रूपी प्रवृत्तियां कैसे ठहर सकती हैं?
  •  जब और जहां भी तुम मेरा स्मरण करोगे मैं तुम्हारे साथ रहूंगा.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.