fbpx
Now Reading:
साई बाबा संत शिरोमणि हैं
Full Article 5 minutes read

साई बाबा संत शिरोमणि हैं

श्री मती खापर्डे श्रद्घालु तथा पूर्ण भक्त थी, इसलिये उनका साई चरणों में अत्यन्त प्रेम था. प्रतिदिन दोपहर को वे स्वयं नैवेघ लेकर मस्जिद को जातीं और जब बाबा उसे ग्रहण कर लेते, तभी वे लौटकर आपना भोजन किया करती थीं. बाबा उनकी अटल श्रद्घा की झांकी का दूसरों को भी दर्शन कराना चाहते थे. 

golden-throne-sai-babaसाई बाबा भक्तों पर स्नेह करने वाले दया के सागर हैं तथा निर्गुण होकर भी भक्तों के प्रेमवश ही जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक मानव शरीर धारण किया, जो भक्त उनकी शरण में आते हैं उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं, ऐसे श्री साईनाथ महाराज को हम सभी को नमन करना चाहिए. श्री साई, जो सन्त शिरोमणि हैं, उनका तो मुख्य ध्येय ही यही है. जो उनके श्री-चरणों की शरण में जाते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट होकर निश्चित ही दिन-प्रतिदिन उनकी प्रगति होती है.
एक बार दादासाहेब खापर्डे सहकुटुम्ब शिरडी आये और कुछ मास वहीं ठहरे. दादा कोई सामान्य व्यक्ति न थे. वे एक धनाढ्य और अमरावती(बरार) के सुप्रसिद्ध वकील तथा केन्द्रीय धारा सभा(दिल्ली) के सदस्य थे. वे विद्वान और वक्ता भी थे. इतने गुणवान होते हुए भी उन्हें बाबा के समक्ष मुंह खोलने का साहस न होता था. अधिकांश भक्तगण तो बाबा से हर समय अपनी शंका का समाधान कर लिया करते थे. केवल तीन व्यक्ति खापर्डे, नूलकर और बूटी ही ऐसे थे, जो सदैव मौन धारण किये रहते तथा अति विनम्र और उत्तम प्रकृति के व्यक्ति थे. दादासाहेब, विघारण्य स्वामी द्वारा रचित पंचदशी नामक प्रसिद्ध संस्कृत ग्रन्थ, जिसमें अद्वैतवेदान्त का दर्शन है, उसका विवरण दूसरों को तो समझाया करते थे, परन्तु जब वे बाबा के समीप मस्जिद में आये तो वे एक शब्द का भी उच्चारण न कर सके. यथार्थे में कोई व्यक्ति, चाहे वह जितना वेद वेदान्तों में पारंगत क्यों न हो, परन्तु ब्रह्मपद को पहुंचे हुए व्यक्ति के समक्ष उसका शुष्क ज्ञान प्रकाश नहीं दे सकता. दादा चार मास तथा उनकी पत्नी सात मास वहां ठहरी. वे दोनों अपने शिरडी-प्रवास से अत्यन्त प्रसन्न थे. श्री मती खापर्डे श्रद्घालु तथा पूर्ण भक्त थी, इसलिये उनका साई चरणों में अत्यन्त प्रेम था. प्रतिदिन दोपहर को वे स्वयं नैवेघ लेकर मस्जिद को जातीं और जब बाबा उसे ग्रहण कर लेते, तभी वे लौटकर आपना भोजन किया करती थीं. बाबा उनकी अटल श्रद्घा की झांकी का दूसरों को भी दर्शन कराना चाहते थे. एक दिन दोपहर को वे सांजा, पूरी, भात, सार, खीर और अन्य भोज्य पदार्थ लेकर मस्जिद में आई. और दिन तो भोजन प्रायः घंटों तक बाबा की प्रतीक्षा में पड़ा रहता था, परन्तु उस दिन वे तुरंत ही उठे और भोजन के स्थान पर आकर आसन ग्रहण कर लिया और थाली पर से कपड़ा हटाकर उन्होंने रुचिपूर्वक भोजन करना आरम्भ कर दिया. तब शामा कहने लगे कि यह पक्षपात क्यों. दूसरो की थालियों पर तो आप दृष्टि तक नहीं डालते, उल्टे उन्हें फेंक देते है, परन्तु आज इस भोजन को आप बड़ी उत्सुकता और रुचि से खा रहे हैं. आज इस बाई का भोजन आपको इतना स्वादिष्ट क्यों लगा. यह विषय तो हम लोगों के लिये एक समस्या बन गया है. तब बाबा ने इस प्रकार समझाया. सचमुच ही इस भोजन में एक विचित्रता है. पूर्व जन्म में यह बाई एक व्यापारी की मोटी गाय थी, जो बहुत अधिक दूध देती थी. पशुयोनि त्यागकर इसने एक माली के कुटुम्ब में जन्म लिया. उस जन्म के उपरान्त फिर यह एक क्षत्रिय वंश में उत्पन्न हई और इसका ब्याह एक व्यापारी से हो गया. दीर्घ काल के पश्चात इनसे भेंट हुई है. इसलिये इनकी थाली में से प्रेमपूर्वक चार ग्रास तो खा लेने दो. ऐसा बतला कर बाबा ने भर पेट भोजन किया और फिर हाथ मुंह धोकर और तृप्ति की चार-पांच डकारें लेकर वे अपने आसन पर पुनः आ बिराजे. फिर श्रीमती खापर्डे ने बाबा को नमन किया और बाबा का पांव दबाने लगीं. बाबा उनसे वार्तालाप करने लगे और साथ-साथ उनके हाथ भी दबाने लगे. इस प्रकार परस्पर सेवा करते देख शामा मुस्कुराने लगा और बोला कि देखो तो, यह एक अदभुत दृश्य है कि भगवान और भक्त एक दूसरे की सेवा कर रहे है. उनकी सच्ची लगन देखकर बाबा अत्यन्त कोमल तथा मृदु शब्दों मे अपने श्रीमुख से कहने लगे कि अब सदैव राजाराम, राजाराम का जप किया करो और यदि तुमने इसका अभ्यास क्रमबद्ध किया तो तुम्हे अपने जीवन के ध्येय की प्राप्ति अवश्य हो जायेगी. तुम्हें पूर्ण शान्ति प्राप्त होकर अत्यधिक लाभ होगा. आध्यात्मिक विषयों से अपरिचित व्यक्तियों के लिये यह घटना साधारण-सी प्रतीत होगी, परन्तु शास्त्रीय भाषा में यह शक्तिपात के नाम से विदित है, अर्थात गुरु द्वारा शिष्य में शक्तिसंचार करना.
कितने शक्तिशाली और प्रभावकारी बाबा के वे शब्द थे, जो एक क्षण में ही हृदय-कमल में प्रवेश कर गये और वहां अंकुरित हो उठे. यह घटना गुरु-शिष्य सम्बन्ध के आदर्श की घोतक है. गुरु-शिष्य दोनों को प्रेम और एक दूसरे की सेवा करनी चाहिये, क्योंकि उन दोनों में कोई भेद नहीं है. वे दोनों अभिन्न और एक ही है, जो कभी पृथक नहीं हो सकते. शिष्य गुरुदेव के चरणों पर मस्तक रख रहा है, यह तो केवल बाहृ दृश्यमान है. आन्तरिक दृष्टि से दोनों अभिन्न और एक ही है तथा जो उनमें भेद समझता है, वह अभी अपरिपक्व और अपूर्ण ही है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.