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शाश्वत साई चेतना
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शाश्वत साई चेतना

अब जरा हम अपने सदगुरु श्री शिरडी साई बाबा का उदाहरण लें. अपना शरीर छोड़ने के पहले बाबा ने बहुत स्पष्ट शब्दों में अपने भक्तों को कुछ आश्वासन दिए थे जो कि बाबा के ग्यारह वचनों के रूप में प्रसिद्ध हैं. उनके ग्यारह वचनों का सार तथ्य यह है कि बाबा अपनी समाधि से भी अपने पुराने एवं नए सभी भक्तों की रक्षा एवं मार्गदर्शन करेंगे. 

Sai-46भक्ति ही ईश्वर या सदगुरु-पूजन का मूल मंत्र है. श्री शिरडी साई बाबा के अनुसार श्रद्धा एवं सबूरी भक्ति मार्ग के दो आवश्यक गुण हैं. भक्ति परंपरा के इतिहास को पढ़ने पर यह अहसास होता है कि एक शरीरधारी सदगुरु के प्रति दृढ़ आस्था रखना सम्भवत: ज्यादा सहज है, बल्कि उन सदगुरुओं के प्रति जो कि शरीर छोड़ चुके हैं. श्री सदगुरु अदृश्य एवं सूक्ष्म क्रिया-कलापों के साथ प्रत्यक्ष रूप में भी जनकल्याण के लिए अपने असंख्य कर्म करते रहते हैं. एक शरीरधारी सदगुरु को भक्तगण अपनी इन्द्रियों के माध्यम से पारस्परिक रूप में तथा प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं, वार्तालाप कर सकते हैं और छू सकते हैं जो कि सदगुरु की निश्चल प्रतिमा, फोटो या चित्र आदि के द्वारा संभव नहीं है. जिन भक्तों ने सदगुरु के मानवीय शरीर-धारण की अवधि में उनके साथ(चाहे वह शारीरिक रूप में उनसे कहीं दूरे हों) एक सूक्ष्म मानसिक प्रक्रिया द्वारा आध्यात्मिक संयोग स्थापित कर लिया, उनके लिए सदगुरु के शरीर छोड़ने के बाद भी इस प्रकार का सूक्ष्म मानसिक सम्पर्क बना रहता है. वो भक्त जो सदगुरु के साथ रहते हुए भी इस प्रकार की प्रगति नहीं कर पाए थे, या तो जो सदगुरु के प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कर पाए थे, ऐसे भक्तों के लिए सदगुरु के शरीर छोड़ने के बाद उनके प्रति उसी प्रकार का श्रद्धा-भाव बनाए रखना कठिन था. इस कारण उनके गुरु ध्यान और एकाग्रता एवं एकनिष्ठता में क्रमश: ह्रास होने की संभावना रहती है. सदगुरु के समक्ष भक्तगण एक प्रकार की सूक्ष्म मन: स्थिति को प्राप्त करते हैं, जिसको हम अन्य भाषा में आध्यात्मिक पोषण या आध्यात्मिक पुष्टिकरण भी कह सकते हैं. सदगुरु के महाप्रयाण के पश्चात उनकी समाधि का पूजन भक्तगण केवल उसके कलात्मक सौंदर्य के कारण ही नहीं करते, बल्कि इसलिए करते हैं कि उस समाधि के नीचे उन सदगुरु का शरीर है, जिनको कि वे प्यार करते हैं.
जो भक्त सदगुरु के महाप्रयाण के बाद जन्म लेते हैं, उनकी स्थिति कुछ और है. सदगुरु से सम्बन्धित अनुभव-प्राप्त उन पुराने भक्तों से या तो फिर उनसे सम्बन्धित विभिन्न पुस्तकों, पत्रिकाओं, दूरदर्शन के कार्यक्रम आदि से सदगुरु के दिव्य गुणों के बारे में उन्हें जो जानकारी प्राप्त होती है, उससे प्रभावित होकर वे भक्त बन जाते हैं. आजकल तो इस प्रकार की सूचनाएं इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है. अत: जब वो सदगुरु के अनुगामी या अनुयायी बन जाते हैं, तो फिर वो (भक्तगण) अपने गुरु से संबन्धित साहित्य पढ़ने लगते हैं, उससे सम्बन्धित प्रश्न करने लगते हैं और अन्य भक्तों के साथ आपसी अनुभवों का आदान-प्रदान भी करने लगत हैं. जब वे सदगुरु की दिव्य संवेदनशीलता और अन्य ईश्वरीय गुणों से प्रभावित हो जाते हैं, तब वे उनकी पूजा भी करनी शुरू कर देते हैं. इस प्रकार करते-करते वे क्रमश: सदगुरु के साथ एक प्रकार का सूक्ष्म मानसिक एवं भावात्मक सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं. वे यह भी अनुभव करने लगते हैं कि सदगुरु आध्यात्मिक प्रगति में उनका मार्गदर्शन करते हैं और उनको सांसारिक कठिनाईयों से बचाते भी रहते हैं.
हालांकि कुछ लोग यह मानते हैं कि केवल एक शरीरधारी सदगुरु ही अपने भक्तों का दिशा-निर्देश कर सकते हैं एवं उनकी रक्षा कर सकते हैं और जब एक बार वे अपना शरीर छोड़ देते हैं तो वे अपने भक्तों को सक्रिय रूप से सहायता नहीं पहुंचा सकते. इसीलिए जिन्हें वे जीवित सदगुरु कहते हैं केवल उन्हीं का अनुसरण करने पर ही बल देते हैं.
अब जरा हम अपने सदगुरु श्री शिरडी साई बाबा का उदाहरण लें. अपना शरीर छोड़ने के पहले बाबा ने बहुत स्पष्ट शब्दों में अपने भक्तों को कुछ आश्वासन दिए थे जो कि बाबा के ग्यारह वचनों के रूप में प्रसिद्ध हैं. उनके ग्यारह वचनों का सार तथ्य यह है कि बाबा अपनी समाधि से भी अपने पुराने एवं नए सभी भक्तों की रक्षा एवं मार्गदर्शन करेंगे. एक बार जब बाबा भाव सामधि में थे तो उन्होंने उस आनन्दमयी अवस्था में कुछ भक्तों के समकक्ष यह भविष्यवाणी की थी कि भविष्य में शिरडी में इतनी संख्या में बड़े और छोटे लोग कतार लगाए उनकी समाधि पर आएंगे कि जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है. उन्होंने यह भी कहा था कि वे गुली गुली(गली गली) में रहेंगे. अब हम यह देखें कि बाबा कि भविष्यवाणी उनकी महासमाधि के नब्बे वर्षों बाद भी कैसे सिद्ध हुई है. पिछले नब्बे वर्षों और पिछले बीस वर्षों में जिस प्रकार बाबा के नाम की ख्याति और भक्तों की संख्या में वृद्धि हुई है, वह अपने में ही चमत्कार हैं. बाबा के नाम से देश भर में हजारों की संख्या में मंदिरों का निर्माण हुआ है और विभिन्न प्रकार के लोग कल्याणकारी (जैसे चिकित्सा, शिक्षा, सामाजिक एवं धार्मिक) गतिविधियों में अपार वृद्धि हुई है. बाबा के नाम एवं उनकी शिक्षाओं के प्रचार प्रसार के लिए विभिन्न भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में पुस्तकों पत्रिकाओं, स्मारिकाओं आदि की इतनी अधिक संख्या में रचना हुई है कि उनका यहां पर उल्लेख कर पाना संभव नहीं है. संपूर्ण विश्व में बाबा के न केवल सैकड़ों नए मंदिरों का निर्माण हो रहा है बल्कि बहुत से अन्य मंदिरों के परिसर में भी उनकी प्रतिमाएं विधिवत स्थापित की जा रही हैं.

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