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साई का हर संदेश राह दिखाता है
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साई का हर संदेश राह दिखाता है

shirdi-sai-baba-AF02_lइस विश्व में असंख्य संत हैं, परंतु अपना पिता (गुरु) ही सच्चा पिता (सच्चा गुरु) है. दूसरे चाहे कितने ही मधुर वचन क्यों न कहते हों, परंतु अपने गुरु का उपदेश कभी नहीं भूलना चाहिए. संक्षेप में सार यही है कि शुद्ध हृदय से अपने गुरु से प्रेम कर, उनकी शरण जाओ और उन्हें श्रद्धापूर्वक साष्टांग नमस्कार करो. तभी तुम देखोगे कि तुम्हारे सम्मुख भवसागर का अस्तित्व वैसा ही है, जैसा सूर्य के समक्ष अंधेरे का. सच तो यह है कि बाबा की हर कथा में कुछ न कुछ संदेश छिपा रहता है.

यह सभी साई भक्त जानते हैं कि बाबा ने काका साहेब दीक्षित को श्री एकनाथ महाराज के दो ग्रंथ श्रीमद्भागवत और भावार्थ रामायण का नित्य पठन करने की आज्ञा दी थी. काकासाहेब इन ग्रंथों का नियमपूर्वक पठन बाबा के समय से करते आए हैं और बाबा के समाधि लेने के उपरांत भी वह उसी प्रकार अध्ययन करते रहे. एक समय चौपाटी (मुंबई) में काकासाहेब प्रातःकाल एकनाथी भागवत का पाठ कर रहे थे. माधवराव देशपांडे (शामा) और काका महाजनी भी उस समय वहां उपस्थित थे. ये दोनों ध्यानपूर्वक पाठ श्रवण कर रहे थे. उस समय 11वें स्कंध के द्वितीय अध्याय का वाचन चल रहा था, जिसमें नवनाथ अर्थात ऋषभ वंश के सिद्ध यानी कवि, हरि, अंतरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविहोर्त्र, द्रुमिल, चमस और कर भाजन का वर्णन है, जिन्होंने भागवत धर्म की महिमा राजा जनक को समझायी थी. राजा जनक ने इन नवनाथों से बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे और इन सभी ने उनकी शंकाओं का बड़ा संतोषजनक समाधान भी किया था. पठन समाप्त होने पर काकासाहेब बहुत निराशापूर्ण स्वर में माधवराव और अन्य लोगों से कहने लगे कि नवनाथों की भक्ति पद्धति का क्या कहना है, परंतु उसे आचरण में लाना कितना दुष्कर है. माधवराव को यह निराशावादी धारणा अच्छी नहीं लगी. वह कहने लगे कि हमारा अहोभाग्य है, जिसके फलस्वरूप ही हमें साई सदृश अमूल्य हीरा हाथ लग गया है, तब फिर इस प्रकार का राग अलापना बड़ी निंदनीय बात है. यदि तुम्हें बाबा पर अटल विश्वास है, तो फिर इस प्रकार चिंतित होने की आवश्यकता ही क्या है? माना कि नवनाथों की भक्ति
अपेक्षाकृत अधिक दृढ़ और प्रबल होगी, परंतु क्या हम लोग भी प्रेम और स्नेहपूर्वक भक्ति नहीं कर रहे हैं. क्या बाबा ने अधिकारपूर्ण वाणी में नहीं कहा है कि श्रीहरि या गुरु के नाम जप से मोक्ष की प्राप्ति होती है. तब फिर भय और चिंता का स्थान ही कहां रह जाता है. परंतु फिर भी माधवराव के वचनों से काकासाहेब का समाधान न हुआ. वे फिर भी दिन भर व्यग्र और चिंतित ही रहे. दरअसल, यह विचार उनके मस्तिष्क में बार-बार चक्कर काट रहा था कि किस विधि से नवनाथों के समान भक्ति की प्राप्ति संभव हो सकेगी. एक महाशय, जिनका नाम आनंदराव पाखाडे था, माधवराव को ढूंढते-ढूंढते वहां आ पहुंचे. उस समय भागवत का पठन हो रहा था. श्री पाखाडे भी माधवराव के समीप जाकर बैठ गए और उनसे धीरे-धीरे कुछ वार्ता भी करने लगे. वे अपना स्वप्न माधवराव को सुना रहे थे. इनकी कानाफूसी के कारण पाठ में विघ्न उपस्थित होने लगा. अतएव काकासाहेब ने पाठ स्थगित कर माधवराव से पूछा कि क्यों, क्या बात हो रही है? माधवराव ने कहा कि कल तुमने जो संदेह प्रकट किया था, यह चर्चा भी उसी का समाधान है. कल बाबा ने श्री पाखाडे को जो स्वप्न दिया है, उसे उनसे ही सुनो. उसमें बताया गया है कि विशेष भक्ति की कोई आवश्यकता नहीं, केवल गुरु को नमन या उनका पूजन करना ही पर्याप्त है. सभी को स्वप्न सुनने की तीव्र इच्छा थी और सबसे अधिक काकासाहेब को. सभी के कहने पर श्री पाखाडे अपना स्वप्न सुनाने लगे, जो इस प्रकार है. मैंने देखा कि मैं एक अथाह सागर में खड़ा हुआ हूं. पानी मेरी कमर तक है और अचानक जब मैंने ऊपर देखा, तो साईबाबा के श्री-दर्शन हुए. वे एक रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान थे और उनके श्री-चरण जल के भीतर थे. यह दृश्य और बाबा का मनोहर स्वरूप देखकर मेरा चित्त बड़ा प्रसन्न हुआ. इस स्वप्न को भला कौन स्वप्न कह सकेगा. मैंने देखा कि माधवराव भी बाबा के समीप ही खड़े हैं और उन्होंने मुझसे भावुकतापूर्ण शब्दों में कहा कि आनंदराव, बाबा के श्री-चरणों पर गिरो. मैंने उत्तर दिया कि मैं भी यही करना चाहता हूं. परंतु उनके श्री-चरण तो जल के भीतर हैं. अब बताओ कि मैं कैसे अपना शीश उनके चरणों पर रखूं. मैं तो निस्सहाय हूं. इन शब्दों को सुनकर शामा ने बाबा से कहा कि अरे देवा, जल में से कृपाकर अपने चरण बाहर निकालिए. बाबा ने तुरंत चरण बाहर निकाले और मैं उनसे तुरंत लिपट गया. बाबा ने मुझे यह कहते हुए आशीर्वाद दिया कि अब तुम आनंदपूर्वक जाओ. घबराने या चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है. अब तुम्हारा कल्याण होगा. उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि एक ज़री के किनारों की धोती मेरे शामा को दे देना, उससे तुम्हें बहुत लाभ होगा. बाबा की आज्ञा को पूर्ण करने के लिए ही श्री पाखाडे धोती लाए और काकासाहेब से प्रार्थना की कि कृपा करके इसे माधवराव को दे दीजिए, परंतु माधवराव ने उसे लेना स्वीकार नहीं किया. उन्होंने कहा कि जब तक बाबा से मुझे कोई आदेश या अनुमति प्राप्त नहीं होती, तब तक मैं ऐसा करने में असमर्थ हूं. कुछ तर्क-वितर्क के पश्र्चारत काका ने दैवी आदेशसूचक पर्चियां निकालकर इस बात का निर्णय करने का विचार किया. काकासाहेब का यह नियम था कि जब उन्हें कोई संदेह हो जाता, तो वे काग़ज़ की दो पर्चियों पर स्वीकार-अस्वीकार लिखकर उसमें से एक पर्ची निकालते थे और जो कुछ उत्तर प्राप्त होता था, उसके अनुसार ही कार्य किया करते थे. इसका भी निपटारा करने के लिए उन्होंने उपयुक्त विधि के अनुसार ही दो पर्चियां लिखकर बाबा के चित्र के समक्ष रख दिया और एक अबोध बालक को उसमें से एक पर्ची उठाने को कहा. बालक द्घारा उठाई गई पर्ची जब खोलकर देखी गई, तो वह स्वीकारसूचक पर्ची ही निकली और तब माधवराव को धोती स्वीकार करनी पड़ी. इस प्रकार आनंदराव और माधवराव संतुष्ट हो गए और काकासाहेब का संदेह भी दूर हो गया.

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