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सर्वधर्म समभाव का संदेश
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सर्वधर्म समभाव का संदेश

अहमद नगर ज़िले का शिरडी गांव अर्सा पहले केवल पोस्टल पहचान रखता था. वही गांव आज साई बाबा की शिरडी के नाम से दुनिया भर में जाना जाता है. बाबा की शिरडी में भक्तों का मेला हमेशा लगा रहता है. यहां आने वालों की तादाद प्रतिदिन 30-35 हज़ार के क़रीब होती है, वहीं गुरुवार एवं रविवार को यह संख्या दोगुनी हो जाती है. इसी तरह रामनवमी, गुरु पूर्णिमा और विजयादशमी के अवसर पर यहां 2-3 लाख लोग दर्शन को आते हैं, वहीं साल भर में लगभग एक करोड़ से अधिक भक्त यहां हाज़िरी लगा जाते हैं. लगभग डेढ़ सौ साल पहले एक युवा फकीर शिरडी की एक खंडहरनुमा मस्जिद में डेरा डालकर चार घरों की भिक्षा से गुजर-बसर करने लगा. लोगों ने उसे साई बाबा के नाम से पुकारा. उसके द्वारा दी जाने वाली जड़ी-बूटियों एवं अंगारे से लोग भले-चंगे होने लगे. इससे लोगों का विश्वास बढ़ता गया और साई बाबा का यश आहिस्ता-आहिस्ता दुनिया भर में फैल गया.

साई बाबा ने अपनी ज़िंदगी में समाज को दो अहम संदेश दिए. पहला संदेश है, सबका मालिक एक और दूसरा श्रद्धा और सबूरी. साई बाबा के इर्द-गिर्द के तमाम चमत्कारों से परे केवल उनके संदेशों पर ही ग़ौर करें तो पाएंगे कि बाबा के कार्य और संदेश जनकल्याणकारी साबित हुए हैं.

साई बाबा ने अपनी ज़िंदगी में समाज को दो अहम संदेश दिए. पहला संदेश है, सबका मालिक एक और दूसरा श्रद्धा और सबूरी. साई बाबा के इर्द-गिर्द के तमाम चमत्कारों से परे केवल उनके संदेशों पर ही ग़ौर करें तो पाएंगे कि बाबा के कार्य और संदेश जनकल्याणकारी साबित हुए हैं. इन संदेशों ने केवल कथनी से ही नहीं, बल्कि सीधे कार्य व व्यवहार से सारे समाज को अपना कायल बनाया. फकीर के वेश में मस्जिद में रहने वाले साई की बोली भी उर्दू मिश्रित थी. वह हमेशा अल्ला मालिक सबका भला करेगा कहते थे, लेकिन जिस मस्जिद में उनका निवास था, उसे वह द्वारकामाई कहकर पुकारते थे. साई बाबा का आचार धर्म हिंदू पद्धति का था. बावजूद इसके बाबा ने अपनी जाति एवं धर्म की थाह कभी किसी को लगने नहीं दी. हिंदू-मुस्लिम दोनों ने ही बाबा को अपना माना. उन्होंने सर्वधर्म समभाव और सह अस्तित्व का मार्ग पूरी दुनिया के सामने रखा. सबका मालिक एक, यह संदेश उनके व्यवहार का ही प्रतीक कहा जा सकता है.

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बाबा के भक्तों में सभी जाति, धर्म एवं पंथ के लोग शामिल हैं. हिंदू बाबा के चरणों में हार-फूल चढ़ाते और समाधि पर दूब रख अभिषेक करते हैं, वहीं मुस्लिम बाबा की समाधि पर चादर चढ़ा सब्ज चढ़ाते हैं. कुल मिलाकर शिरडी सर्वधर्म समभाव के धार्मिक सह अस्तित्व का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन यहां आने वाले भक्त इन सबसे परे केवल मन में बाबा के प्रति श्रद्धा और विश्वास के चलते खिंचे चले आते हैं. उनके मन में आध्यात्मिक शांति की चाह के साथ सुख की कामना नज़र आती है. इंसान अपनी श्रद्धा को हमेशा निजी सुख-दुःख से जोड़कर देखता आया है. आज के बदलते आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संक्रमण के दौर में अपने इर्द-गिर्द की अस्थिरता, अनिश्चितता के बीच भक्त कभी-कभी कुछ हकबकाहट में साई बाबा के प्रति श्रद्धा की महीन डोर थामे शिरडी चला आता है, जहां उसके तमाम सवालों के जवाब मिल जाते हैं.

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साई बाबा द्वारा बताए श्रद्धा और सबूरी शब्दों का इस्तेमाल कई भक्त उनका आशीर्वाद पाने के लिए भी करते हैं. जैसे किसी को कोई नया काम हाथ में लेना हो तो वह श्रद्धा, सबूरी, हां या नहीं जैसी चार चिट्ठियां तैयार कर साई बाबा के सम्मुख रखता है और श्रद्धापूर्वक उसमें से एक चिट्ठी खोलता है. यदि उसमें हां है तो बाबा का आशीर्वाद मान लेता है और यदि जवाब नहीं में मिलता है तो बाबा का इंकार मान नए काम का इरादा छोड़ देता है. यदि चिट्ठी का जवाब श्रद्धा है तो बाबा में श्रद्धा रख काम आगे शुरू किया जाता है, लेकिन यदि जवाब सबूरी हो तो थोड़ा संयम रखें, ऐसा अर्थ निकाला जाता है. बाबा का आशीर्वाद पाने वाले ऐसे कई भक्त शिरडी में मिल जाएंगे. गत ढाई-तीन दशकों से साई बाबा के प्रति लोगों की आस्था में निरंतर इज़ा़फा हो रहा है. यही वजह है कि साई बाबा के उत्सव में शामिल होने अमीर-ग़रीब और सभी जाति-धर्म के भक्त बड़ी तादाद में आते हैं. जय श्री साई राम.

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