fbpx
Now Reading:
शिरडी साई बाबा का जीवन ही संदेश है
Full Article 5 minutes read

शिरडी साई बाबा का जीवन ही संदेश है

आज इसे साई बाबा की शिरडी के नाम से दुनिया भर में जाना जाता है. साई बाबा पर यह विश्‍वास जाति-धर्म व राज्यों से परे देशों की सीमा लांघ चुका है. यही वजह है कि बाबा की शिरडी में भक्तों का मेला हमेशा लगा रहता है, जिसकी तादाद प्रतिदिन जहां 30 हजार के करीब होती है, वहीं गुरुवार व रविवार को यह संख्या दुगुनी हो जाती है. इसी तरह साई बाबा के प्रति आस्था और विश्‍वास के चलते रामनवमी, गुरुपूर्णिमा और विजयादशमी पर जहां 2-3 लाख लोग दर्शन को आते हैं, वहीं सालभर में लगभग 1 करोड़ से अधिक भक्त यहां हाजिरी लगा जाते हैं.

Sai-46शिरडी के साई बाबा का मंदिर विश्‍व भर में प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में से एक है. शिरडी महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के कोपरगांव तालुका में है. गोदावरी नदी पार करने के बाद मार्ग सीधा शिरडी को जाता है. आठ मील चलने पर जब आप नीमगांव पहुंचेंगे तो वहां से शिरडी दिखाई देने लगता है. श्री साईनाथ ने शिरडी में अवतरित होकर उसे पावन बनाया.

श्री साई बाबा की जन्मतिथि, जन्म स्थान और माता-पिता के बारे में किसी को भी जानकारी नहीं है. इस संबंध में बहुत छानबीन की गई. बाबा से तथा अन्य लोगों से भी इस विषय में पूछताछ की गई, परंतु कोई संतोषप्रद उत्तर अथवा सूत्र हाथ न लग सका. वैसे साई बाबा को कबीर का अवतार भी माना जाता है. बाबा की एकमात्र प्रामाणिक जीवन कथा श्री साई सतचरित है जिसे श्री अन्ना साहेब दाभोलकर ने सन 1914 में लिपिबद्ध किया. ऐसा विश्‍वास किया जाता है कि साई बाबा का जन्म सन 1835 में महाराष्ट्र के परभणी जिले के पाथरी गांव मेंभुसारी परिवार में हुआ था. (सत्य साई बाबा ने बाबा का जन्म 27 सितंबर 1830 को पाथरी गांव में बताया है.) इसके बाद 1854 में वे शिरडी में ग्रामवासियों को एक नीम के पेड़ के नीचे बैठे दिखाई दिए. अनुमान है कि सन 1835 से लेकर 1846 तक पूर 12 साल तक बाबा अपने पहले गुरु रोशनशाह फकीर के घर रहे. 1846 से 1854 तक बाबा बैंकुशा के आश्रम में रहे. सन 1854 में वे पहली बार नीम के वृक्ष के नीचे बैठे हुए दिखाई दिए. कुछ समय बाद बाबा शिरडी छोड़कर किसी अज्ञात जगह पर चले गए और चार वर्ष बाद 1858 में लौटकर चांद पाटिल के संबंधी की शादी में बारात के साथ फिर शिरडी आए. इस बार वे खंडोबा के मंदिर के सामने ठहरे थे. इसके बाद के साठ वर्षों 1858 से 1918 तक बाबा शिरडी में अपनी लीलाओं को करते रहे और अंत तक यहीं रहे. ऐसे महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में गोदावरी नदी के तट बड़े ही भाग्यशाली हैं, जिन पर अनेक संतों ने जन्म लिया और अनेक ने वहां आश्रय पाया.
आज इसे साई बाबा की शिरडी के नाम से दुनिया भर में जाना जाता है. साई बाबा पर यह विश्‍वास जाति-धर्म व राज्यों से परे देशों की सीमा लांघ चुका है. यही वजह है कि बाबा की शिरडी में भक्तों का मेला हमेशा लगा रहता है, जिसकी तादाद प्रतिदिन जहां 30 हजार के करीब होती है, वहीं गुरुवार व रविवार को यह संख्या दुगुनी हो जाती है. इसी तरह साई बाबा के प्रति आस्था और विश्‍वास के चलते रामनवमी, गुरुपूर्णिमा और विजयादशमी पर जहां 2-3 लाख लोग दर्शन को आते हैं, वहीं सालभर में लगभग 1 करोड़ से अधिक भक्त यहां हाजिरी लगा जाते हैं.
लगभग डेढ़ सौ साल पहले एक युवा फकीर शिरडी की खंडहरनुमा मस्जिद में डेरा डालकर चार घरों की भिक्षा से गुजर-बसर करने लगा. लोगों ने उसे साई बाबा के नाम से पुकारा. उसकी दी जड़ी-बूटियों व अंगारे से लोग भले-चंगे होने लगे. इससे लोगों का विश्‍वास बाबा में बढ़ता गया और साई बाबा का नाम आहिस्ता-आहिस्ता देश-दुनिया में फैल गया, जो आज लोगों की श्रद्धा का केंद्र है. बाबा के भक्तों में सभी जाति-धर्म-पंथ के लोग शामिल हैं. जहां हिन्दू बाबा के चरणों में हार-फूल चढ़ाते, समाधि पर दूब रख अभिषेक करते हैं. वहीं मुस्लिम बाबा की समाधि पर चादर चढ़ाते हैं. कुल मिलाकर बाबा की शिरडी सर्वधर्म समभाव के धार्मिक सहअस्तित्व का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन यहां आने वाले भक्त तो इन सबसे परे केवल मन में उनके प्रति श्रद्धा और विश्‍वास के कारण खिंचे चले आते हैं. साई बाबा ने अपनी जिंदगी में समाज को दो अहम संदेश दिए हैं- सबका मालिक एक और श्रद्धा और सबूरी. साई बाबा के इर्द-गिर्द के तमाम चमत्कारों से परे केवल उनके संदेशों पर ही गौर करें तो पाएंगे कि बाबा के कार्य और संदेश जनकल्याणकारी साबित हुए हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.