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श्री साईं अवतार
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श्री साईं अवतार

sai baba

sai babaशिरडी के श्री साईंबाबा को वास्तव में सद्गुरु, फकीर, औलिया, महायोगी और विशेष रूप से ‘युग का अवतार’ कहा जाता है. बाबा जब शिरडी में थे, तो कुछ संत वहां आया करते थे. शिरडी आने वाले एक ऐसे ही संत गंगागीर ने नवयुवक साईं को देखकर यह कहा था कि यह नवयुवक कचरे के ढेर के नीचे पड़े हुए एक रत्न की तरह है.

साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि एक दिन इसका अलौकिक तेज शिरडी को महिमामय बना देगा. मेहर बाबा (जो कि बाबा के मुख्य शिष्य श्री उपासनी महाराज के शिष्य थे) ने यह कहा था कि जिस रूप में उन्होंने श्री साईं को जाना है, निश्चित ही श्री साईं इस सृष्टि के आदि और अंत हैं. श्री उपासनी महाराज ने भी श्री साईं के संबंध में बहुत कुछ कहा है कि सब कुछ श्री साईं ही हैं.

इस प्रकार श्री साईं के विषय में बहुत कुछ कहा और लिखा गया है. उनके गुणों को दर्शाने वाले सैकड़ों विशेषण उनके नाम के साथ लगाए जाते हैं. बाबा के ईश्वरीय गुणों और उनके नाम को महिमा-मंडित करने वाले साईंनाथ अष्टोत्तरशतनामावली का वाचन/जाप बाबा के बहुत से मंदिरों में किया जाता है. बाबा की महिमा अथाह एवं अपरंपार है.

वे जब देह-रूप में शिरडी में थे, तब उनके समकालीन भक्तों ने उनसे संबंधित चमत्कारपूर्ण क्रिया-कलापों एवं उनके प्रति भक्तों के भावनात्मक लगाव के विषय में बहुत विस्तारपूर्वक लिखा था. आज भी लोगों को बाबा के विस्मयकारी अनुभव हो रहे हैं और बाबा के प्रति उनका भावनात्मक लगाव बढ़ रहा है- इस पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है. करोड़ों लोग बाबा के प्रति आकर्षित हो रहे हैं और पूरे भारत में बाबा के हजारों मंदिर निर्मित हो चुके हैं.

बाबा के कुछ मंदिर अन्य देशों में भी बने हैं. उनकी फोटो हर जगह देखी जा सकती है. इस प्रकार उनकी महिमा निरंतर बढ़ती जा रही है. आज बहुत से लोगों के लिए साईं ही मालिक हैं और वही पिता हैं. बाबा के भक्तों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है और यह साईं-लहर धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से मानवता को आत्मसात कर रही है.

किसी भी अनुमान, अटकल या कल्पना के परे मूल बात तो यह है कि श्री साईं के दिव्य/ईश्वरीय स्वरूप एवं उनकी महत्‌ स्थिति के विषय में अब तक निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है. विभिन्न धर्म-ग्रन्थों में ईश्वर का गुणगान करने के लिए जिन विशेषणों का प्रयोग हुआ है, उन सभी का प्रयोग हिंदू लोग श्री साईं के ईश्वरीय गुणों एवं उनकी लीला का वर्णन करने के लिए करते हैं. श्री साईं की उपासना साईं महाराज, साईं भगवान, साईं राम, साईं कृष्ण, साईं विट्‌ठल, साईं विष्णु, साईं शंकर, साईं अवतार और साईं ईश्वर आदि न जाने कितने रूपों में की जाती है.

यदि कोई श्री साईं के ईश्वरीय स्वरूप और अलौकिक गुणों के संबंध में प्रयुक्त विभिन्न विशेषणों का विश्लेषण करे तो वह इसी निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि यद्यपि शिरडी में श्री साईं ने एक सद्गुरु की भूमिका निभाई लेकिन वे इसके बहुत आगे थे. श्री साईं ने मानव-देह बहुत पहले ही त्याग दी थी. बहुत से गुरुओं की यह प्रथा है कि वे अपनी संस्था बनाते हैं और अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते हैं, किंतु बाबा ने न तो कोई संस्था बनाई और न ही बाह्‌य रूप से अपना कोई उत्तराधिकारी बनाया.

वे वस्तुतः अपने भक्तों की आध्यात्मिक चेतना का विकास करने आए थे. यह बात दूसरी है कि मूक रूप से अपने दयापूर्ण क्रिया-कलापों द्वारा उन्होंने सभी की भौतिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति की. शिरडी में श्री साईं जिस रूप में दिखते थे, उसका विश्लेषण करने से यह साफ पता चलता है कि वे सांसारिक आवश्यकताओं से पूर्णतः विरक्त थे. कभी-कभी वे जलाली की स्थिति में (अर्थात्‌ आध्यात्मिक रूप से कभी शांत एवं कभी उग्र) रहते थे. अपनी आध्यात्मिक शक्तियों का उपयोग उन्होंने अपने असंख्य भक्तों के कल्याण के लिए किया.

उन्होंने जाति, धर्म, मत या सिद्धांत, भाषा, सांसारिक पद-प्रतिष्ठा आदि को महत्त्व न देते हुए, सभी के प्रति अपनी समान दृष्टि रखी. उनकी ईश्वरीय करुणा सभी के लिए- यहां तक कि पशुओं के प्रति भी थी. ईश्वरीय प्रेम में लीन श्री साईं इस लोक में होते हुए भी लोकोत्तर धरातल पर रहकर परम आनंद की स्थिति में थे. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिरडी के उस छोटे से गांव में वे एक साधारण व्यक्ति की भांति रहे-बिना कुछ कहे कि उनकी कोई गद्दी या पीठ है (जैसा कि बहुत से गुरु करते हैं). बाबा साठ वर्षों तक एक ही स्थान पर रहे और इस दौरान जो भी उनके पास आया, बदले में बिना कुछ चाहे उन्होंने उनकी मनोकामनाएं पूर्ण कीं.

आज श्री साईं का नाम भारत के अधिकतर लोग जानते हैं. शिरडी एक तीर्थ बन गया है, जहां संसार भर के भक्त कतार लगाए हुए हैं. व्यापक साईं-प्रवाह को-जिसे कि कुछ लोग ‘साईंपथ’ भी कहते हैं, बहुत तेजी से फैल रहा है. भक्तों की मात्र आत्म-प्रेरणा से हुए ऐसे विस्तार से यह संकेत मिलता है कि अपनी समाधि लेने के छियासी वर्ष पश्चात भी ‘साईं’ कितनी अद्भुत ‘शक्ति’ हैं. पूर्व युगों में भी सभी अवतारों के संबंध में ऐसा ही हुआ है.

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