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आशा और विश्वास जगाते हैं साई बाबा
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आशा और विश्वास जगाते हैं साई बाबा

एक बार गोवा के एक मामलतदार ने, जिनका नाम राले था, लगभग 300आमों का एक पार्सल शामा के नाम शिरडी भेजा. पार्सल खोलने पर प्रायः सभी आम अच्छे निकले. भक्तों में इनके वितरण का कार्य शामा को सौंपा गया. उनमें से बाबा ने चार आम दामू अण्णा के लिये पहले निकाल कर रख लिये. दामू अण्णा की तीन स्त्रियां थीं. 

Sai-Baba-Shirdi-(2)जो भक्त साई बाबा को केवल भक्तिपूर्वक एक पत्र, फूल, फल या जल भी अर्पण करता है, तो साई बाबा उस शुद्ध अन्तःकरण वाले भक्त के द्वारा अर्पित की गई वस्तु को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं. बाबा अपने भक्तों से कितना प्रेम करते और उनकी समस्त इच्छाओं तथा समाचारों को पहले से ही जान लेते थे.

माधवराव देशपांडे के द्वारा बाबा का हाथ जल जाने का समाचार पाकर श्रीनानासाहेव चांदोरकर, बम्बई के सुप्रसिद्ध डॉक्टर श्री परमानंद के साथ दवाईयां, लेप तथा पट्टियां आदि साथ लेकर शीघ्रता से शिरडी को आये. उन्होंने बाबा से डॉक्टर को परमानन्द को हाथ की परीक्षा करने और जले हुए स्थान में दवा लगाने की अनुमति मांगी. यह प्रार्थना अस्वीकृत हो गई. हाथ जल जाने के पश्चात एक कुष्ठ-पीड़ित भक्त भागोजी सिंधिया उनके हाथ पर सदैव पट्टी बांधते थे. उनका कार्य था प्रतिदिन जले हुए स्थान पर घी मलना और उसके ऊपर एक पत्ता रखकर पट्टियों से उसे पुनः पूर्ववत कस कर बांध देना. घाव शीघ्र भर जाये, इसके लिये नानासाहेब चांदोरकर ने पट्टी छोड़ने तथा डॉक्टर परमानन्द से जांच व चिकित्सा कराने का बाबा से बारंबार अनुरोध किया. यहां तक कि डॉ. परमानन्द ने भी अनेक बार प्रर्थना की, परन्तु बाबा ने यह कहते हुए टाल दिया कि केवल भगवान ही मेरा डॉक्टर है. उन्होंने हाथ की परीक्षा करवाना अस्वीकार कर दिया. डॉ. परमानन्द की दवाइयां शिरडी के वायुमंडल में न घुल सकीं और न उनका उपयोग ही हो सका. फिर भी डॉक्टर साहब की अनुमति मिल गई. कुछ दिनों के उपरांत जब घाव भर गया, तब सब भक्त प्रसन्न हो गये, लेकिन यह किसी को भी ज्ञात न हो सका कि कुछ पीड़ा अवशेष रही थी या नहीं. प्रतिदिन प्रातःकाल वही क्रम-घृत से हाथ का मर्दन और पुनः कस कर पट्टी बांधना साई बाबा की समाधि पर्यन्त यह कार्य इसी प्रकार चलता रहा. साई बाबा को इस चिकित्सा की भी कोई आवश्यकता नहीं थी, परन्तु भक्तों के प्रेमवश, उन्होंने भागोजी की यह सेवा स्वीकार की.
बाबा भक्तों के सभी इच्छाओं को जान जाते हैं और सभी समस्ता इच्छाएं पूर्ण करते हैं इसी पर आधारित है नीचे दी गई कथा.
एक बार गोवा के एक मामलतदार ने, जिनका नाम राले था, लगभग 300आमों का एक पार्सल शामा के नाम शिरडी भेजा. पार्सल खोलने पर प्रायः सभी आम अच्छे निकले. भक्तों में इनके वितरण का कार्य शामा को सौंपा गया. उनमें से बाबा ने चार आम दामू अण्णा के लिये पहले निकाल कर रख लिये. दामू अण्णा की तीन स्त्रियां थीं. परन्तु अपने दिये हुये वक्तव्य में उन्होंने बतलाया था कि उनकी केवल दो ही स्त्रियां थीं. वे सन्तानहीन थे, इस कारण उन्होंने अनेक ज्योतिषियों से इसका समाधान कराया और स्वयं भी ज्योतिष शास्त्र का थोड़ा सा अध्ययन कर ज्ञात कर लिया कि जन्म कुण्डली में एक पापग्रह के स्थित होने के कारण इस जीवन में उन्हें सन्तान का मुख देखने का कोई योग नहीं है . परन्तु बाबा के प्रति तो उनकी अटल श्रद्घा थी. पार्सल मिलने के दो घण्टे पश्चात ही वे पूजनार्थ मस्जिद में आये. उन्हें देख कर बाबा कहने लगे कि लोग आमों के लिये चक्कर काट रहे हैं, परन्तु ये तो दामू के हैं. जिसके हैं, उन्हीं को खाने और मरने दो. इन शब्दों को सुन दामूअण्णा के हृदय पर वज्राघात सा हुआ, परन्तु म्हालसापति (शिरडी के एक भक्त) ने उन्हें समझाया कि इस मृत्यु श्ब्द का अर्थ अहंकार के विनाश से है और बाबा के चरणों की कृपा से तो वह आशीर्वाद स्वरुप है, तब वे आम खाने को तैयार हो गये. इस पर बाबा ने कहा कि वे तुम न खाओ, उन्हें अपनी छोटी स्त्री को खाने दो. इन आमों के प्रभाव से उसे चार पुत्र और चार पुत्रियां उत्पन्न होंगी. यह आज्ञा शिरोधार्य कर उन्होंने वे आम ले जाकर अपनी छोटी स्त्री को दिये. धन्य है साईबाबा की लीला, जिन्होंने भाग्य-विधान पलट कर उन्हें सन्तान-सुख दिया. बाबा की स्वेच्छा से दिये वचन सत्य हुये, ज्योतिषियों के नहीं. बाबा के जीवन काल में उनके शब्दों ने लोगों में अधिक विश्वास और महिमा स्थापित की, परन्तु महान आश्चर्य है कि उनके समाधिस्थ होने कि उपरान्त भी उनका प्रभाव पूर्ववत ही है. बाबा ने कहा कि मुझ पर पूर्ण विश्वास रखो. यद्यपि मैं देहत्याग भी कर दूंगा, परन्तु फिर भी मेरी अस्थियां आशा और विश्वास का संचार करती रहेंगी. केवल मैं ही नहीं, मेरी समाधि भी वार्तालाप करेगी, चलेगी, फिरेगी और उन्हें आशा का सन्देश पहुंचाती रहेगी, जो अनन्य भाव से मेरे शरणागत होंगे. निराश न होना कि मैं तुमसे विदा हो जाऊंगा. तुम सदैव मेरी अस्थियों को भक्तों के कल्याणार्थ ही चिंतित पाओगे. यदि मेरा निरन्तर स्मरण और मुझ पर दृढ़ विश्वास रखोगे तो तुम्हें अधिक लाभ होगा और तुम सदा प्रसन्न रहोगे.

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