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उत्तराखंड : तबाही के लिए सरकार है ज़िम्मेदार

उत्तराखंड : तबाही के लिए सरकार है ज़िम्मेदार

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सरकार ने अगर पिछली घटनाओं से सबक लेते हुए समय रहते एहतियात के तौर पर आवश्यक क़दम उठाए होते, तो लोगों की जानें बच सकती थीं, लेकिन उसे तो भ्रष्टाचार और लूट-खसोट से फुर्सत नहीं है. नेताओं को भाषणबाजी से फुर्सत नहीं है. हकीकत तो यह है कि राज्य में आधारभूत सुविधाएं ही नहीं हैं और जो थोड़ी-बहुत हैं, वह भी बदतर हालत में हैं.

 राज्य में भारी बारिश से तबाही का जो मंजर देखने को मिला, उसके पीछे सरकार का उदासीन रवैया ही ज़िम्मेदार है. उक्त धार्मिक यात्राएं पहले से ही तय होती हैं. सवाल यह उठता है कि ऐसी स्थिति में सरकार समय से पहले कुछ क्यों नहीं करती? सवाल यह भी उठता है कि सरकार तीर्थयात्रियों से मिलने वाले राजस्व का क्या करती है? कहीं यह राजस्व भी सरकार की लूट की भेंट तो नहीं चढ़ जाता?

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त्तराखंड में आई भारी बारिश के बाद बाढ़ की विनाशलीला में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई और हज़ारों लोग लापता हैं. क़रीब 12 हज़ार फुट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ मंदिर के आसपास सब कुछ बह गया है. केदारनाथ मंदिर और उसके आसपास मलबे का अंबार लग गया है. राज्य के पिथौरागढ़ की धारचुला तहसील में भी हालात बदतर दिखे. नदियों ने अपना रौद्र रूप दिखाया और गांव के गांव उनकी तेज धारा में बह गए. कुदरत के इस कहर के कारण चारधाम यात्रा स्थगित कर दी गई. जहां-तहां फंसे लोगों को 5000 से ज़्यादा सेना के जवानों और हेलिकॉप्टरों की मदद से सुरक्षित निकाला गया.

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राज्य में भारी बारिश से तबाही का जो मंजर देखने को मिला, उसके पीछे सरकार का उदासीन रवैया ही ज़िम्मेदार है. उक्त धार्मिक यात्राएं पहले से ही तय होती हैं. सवाल यह उठता है कि ऐसी स्थिति में सरकार समय से पहले कुछ क्यों नहीं करती? सवाल यह भी उठता है कि सरकार तीर्थयात्रियों से मिलने वाले राजस्व का क्या करती है? कहीं यह राजस्व भी सरकार की लूट की भेंट तो नहीं चढ़ जाता? उत्तराखंड में न तो सड़कों की स्थिति सही है और न बिजली-पानी की मुकम्मल व्यवस्था है. अगर सरकार समय रहते इन आधारभूत चीजों को लेकर सजग रहती, तो तबाही के कारण हुआ यह नुक़सान कम हो सकता था. सैकड़ों लोगों की मौत, हज़ारों लोगों के लापता होने और गांव के गांव बह जाने के बावजूद सरकार कुंभकर्णी नींद में सोई हुई है. आश्‍चर्य की बात तो यह है कि राहत और बचाव कार्य भी पर्याप्त नहीं हैं. हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी ने आपदा प्रभावित क्षेत्रों का जायजा लिया और 1000 करोड़ रुपये देने की घोषणा भी की, जिसमें से 145 करोड़ रुपये तुरंत देने का वादा भी किया गया. एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि केंद्र सरकार ने बचाव एवं राहत कार्यों और मुआवजे के लिए जो धनराशि आज दी है, उसे अगर पहले, यानी समय रहते राज्य के आपदा प्रभावित क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं के विकास पर खर्च कर दिया गया होता, तो शायद आज यह भयावह स्थिति न आई होती!

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