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कन्या भ्रूण हत्या एक बड़ी समस्या

आज समाज में अपराध बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं. इनमें एक जघन्य अपराध भ्रूण हत्या भी है. इस अपराध के पीछे इच्छित संतान है. इसे अंजाम देने के लिए वैज्ञानिक आविष्कार सहयोगी बने हैं. परिणामस्वरूप गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण कराना और अनचाही संतान से छुटकारा पाना सहज हो गया है. जनसंख्या नियंत्रण को प्राथमिकता देने वाली सरकार ने जबसे भ्रूण हत्या को क़ानूनी वैधता प्रदान की है, तबसे विश्व में भूण हत्याओं का क्रूर व्यापार निर्बाध गति से बढ़ रहा है. भगवान महावीर, बुद्ध एवं गांधी जैसे प्रेरकों के इस अहिंसा प्रधान देश में हिंसा का नया रूप भारतीय संस्कृति का उपहास है. भारत में क़रीब ढाई दशक पूर्व भ्रूण परीक्षण पद्धति की शुरुआत हुई, जिसे एमिनो सिंथेसिस नाम दिया गया. एमिनो सिंथेसिस का उद्देश्य है, गर्भस्थ शिशु के  क्रोमोसोम्स के संबंध में जानकारी हासिल करना. यदि उनमें किसी भी तरह की विकृति हो, जिससे शिशु की मानसिक-शारीरिक स्थिति बिगड़ सकती हो तो उसका उपचार करना. लेकिन पिछले क़रीब दस-पंद्रह वर्षों से एमिनो सिंथेसिस राह भटक गया है. आज अधिकांश माता-पिता गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य की चिंता छोड़कर भ्रूण परीक्षण केंद्रों में यह पता लगाते हैं कि वह लड़का है अथवा लड़की.

यह कटु सत्य है कि लड़का होने पर उस भ्रूण के  साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होती, किंतु लड़की की इच्छा न होने पर उस भ्रूण से छुटकारा पाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है. अब सवाल यह उठता है कि देवी स्वरूप, निस्वार्थ भाव से सुख-सुविधाओं का बलिदान करने वाली मां उस अजन्मे शिशु को मारने की स्वीकृति कैसे दे देती है? क्या उस बच्ची को जीने का अधिकार नहीं है? उस बेचारी ने कौन सा अपराध किया है? यह कृत्य मानवीय दृष्टि से भी उचित नहीं है. प्रत्येक प्राणी जीना चाहता है. किसी को जीने के अधिकार से वंचित करना पाप है. वैदिक धर्म में भ्रूण हत्या को ब्रह्म हत्या से भी बड़ा पाप बताया गया है. कहा गया है कि ब्रह्म हत्या से जो पाप लगता है, उससे दोगुना पाप गर्भपात से लगता है. इसका कोई प्रायश्चित नहीं है. जैन दर्शन में भी इसे नरक की गति पाने का कारण माना गया है. आश्चर्य है कि धार्मिक कहलाने वाला और चींटी की हत्या से भी कांपने वाला समाज आंख मूंद कर कैसे भ्रूण हत्या कराता है! यह मानव जाति को कलंकित करने वाला अपराध है.

देश का एक ज़िला ऐसा भी है, जहां के युवा वर्ग ने एक खास अभियान चला रखा है. सोनभद्र ज़िले के  राबट्‌र्सगंज ब्लॉक के तीन गांवों मझुवी, भवानीपुर एवं गइर्डगढ़ के 60 युवाओं ने एक मंडली तैयार की है, जो अपने गांव में होने वाली किसी भी धर्म-जाति की कन्या की शादी में टेंट से लेकर बर्तन तक का काम ख़ुद संभालती है.

अमेरिका में 1994 में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें डॉ. निथनसन ने एक अल्ट्रासाउंड फिल्म (साइलेंट स्क्रीन) दिखाई. उसमें बताया गया कि 10-12 सप्ताह की कन्या की धड़कन जब 120 की गति में चलती है, तब बड़ी चुस्त होती है, लेकिन जैसे ही पहला औज़ार गर्भाशय की दीवार को छूता है तो बच्ची डर से कांपने लगती है और अपने आप में सिकुड़ने लगती है. औज़ार के स्पर्श करने से पहले ही उसे पता लग जाता है कि हमला होने वाला है. वह अपने बचाव के लिए प्रयत्न करती है. औज़ार का पहला हमला कमर और पैर पर होता है. गाजर-मूली की भांति उसे काट दिया जाता है. कन्या तड़पने लगती है. फिर जब उसकी खोपड़ी को तोड़ा जाता है तो एक मूक चीख के साथ उसका प्राणांत हो जाता है. यह दृश्य हृदय को दहला देता है. इस निर्मम कृत्य से ऐसा लगता है, मानों कलियुग की क्रूर हवा से मां के दिल में करुणा का दरिया सूख गया है. तभी तो दिन-प्रतिदिन कन्या भ्रूण हत्याओं की संख्या बढ़ रही है. यह भ्रूण हत्या का सिलसिला इसी रूप में चलता रहा तो भारतीय जनगणना में कन्याओं की घटती संख्या से भारी असंतुलन पैदा हो जाएगा. यदि बदलाव नहीं आया तो आने वाले कुछ वर्षों में ऐसी स्थिति आ जाएगी कि विवाह योग्य लड़कों के लिए लड़कियां नहीं मिलेंगी.

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आंकड़े बताते हैं कि 2001 की जनगणना के अनुसार, 1000 लड़कों पर पंजाब में 793, गुजरात में 878, दिल्ली में 865, हरियाणा में 820, हिमाचल में 897, राजस्थान में 909, महाराष्ट्र में 913, बंगाल में 963 लड़कियां हैं. ईसाइयों में लिंगानुपात की स्थिति काफी अच्छी है. इस समुदाय में 2001 की जनगणना के अनुसार, 1.19 करोड़ लड़कों की तुलना में 1.29 लड़कियां हैं. मौजूदा हालात को देखते हुए आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक सोच बदली जाए, मानदंड बदले जाएं, लड़कों और लड़कियों के बीच भेदभाव समाप्त किया जाए. आज की परिस्थिति में लड़का हो या लड़की, उसके अंदर शिक्षा एवं संस्कार भरने की ज़रूरत है. लड़कियों के जन्म से घबराने की अपेक्षा उनके जीवन के निर्माण की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए. यही समाज के लिए श्रेयस्कर होगा. संस्कारी और सुयोग्य कन्याओं से परिवार भी सुरभित बनेगा, जो समाज एवं राष्ट्र के लिए उपयोगी सिद्ध होगा. हालांकि कुछ राज्यों में सरकार द्वारा कन्या भ्रूण हत्या पर प्रतिबंध लगाया गया है. इस प्रतिबंध का कोई असर तब तक नहीं होगा, जब तक मनुष्य की मनोवृत्ति नहीं बदलेगी और भोगवृत्ति सीमित नहीं होगी.

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इसी क्रम में यह सुखद संदेश देना भी ज़रूरी है कि आज कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए, देश का एक ज़िला ऐसा भी है, जहां के युवा वर्ग ने एक खास अभियान चला रखा है. सोनभद्र ज़िले के  राबट्‌र्सगंज ब्लॉक के तीन गांवों मझुवी, भवानीपुर एवं गइर्डगढ़ के 60 युवाओं ने एक मंडली तैयार की है, जो अपने गांव में होने वाली किसी भी धर्म-जाति की कन्या की शादी में टेंट से लेकर बर्तन तक का काम ख़ुद संभालती है. इस मंडली ने बड़े-बड़े दानियों से दान लेकर नहीं, बल्कि ख़ुद अपने संसाधनों से शादी- विवाह में काम आने वाले तमाम छोटे-बड़े साजोसामान जुटाए हैं. मंडली से जुड़े युवा लड़की के घर वालों को आर्थिक मदद देने के साथ-साथ मिनटों में हर सामान की व्यवस्था कर देते हैं. 2002 में बने इस संगठन से लाभांवित होने के बाद लोगों की भावनाएं बदली हैं. यूं तो बेटी का विवाह एक सामाजिक परंपरा है, लेकिन अगर ऐसे ही बेटी वालों की मदद की जाने लगे तो कन्या भ्रूण हत्या जैसी विकृत सोच रखने वाले लोगों के भी विचार बदलेंगे. बहरहाल, यह समझ में नहीं आता कि आज हम इंसान बनना क्यों भूलते जा रहे हैं. जो लोग भ्रूण हत्या के  बारे में सोचते हैं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि बेटियों से घर-आंगन में रौनक है. ममता, प्रेम, त्याग, रक्षाबंधन और न जाने कितनी परंपराएं उन्हीं बेटियों के चलते जीवित हैं. इस स्थिति को देखकर कह सकते हैं कि कन्या भ्रूण हत्या पाप ही नहीं, देश और समाज के लिए अभिशाप भी है. इसे कड़ाई के साथ रोकने की ज़रूरत है.

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3 comments

  • […] कन्या भूर्ण हत्या का एक बड़ा कारण दहेज प्रथा भी है| लोग लड़कियों को पराया धन समझते हैं, उनकी शादी के लिए दहेज की व्यवस्था करनी पड़ती है| दहेज जमा करने के लिए कई परिवारों को कर्ज भी लेना पड़ता है, इसलिए भविष्य में इस प्रकार की समस्याओं से बचने के लिए लोग गर्भावस्था में ही लिंग परीक्षण करवाकर कन्या भूर्ण होने की स्थिति में उसकी हत्या करवा देते हैं| हमारे समाज में महिलाओं से अधिक पुरुषों को महत्व दिया जाता है, परिवार का पुरुष सदस्य ही परिवार के भरण -पोषण के लिए धनोपार्जन करता था| अभी भी कामकाजी महिलाओं की संख्या बहुत कम है| उन्हें सिर्फ घर के कामकाज तक सिमित रखा जाता है| […]

  • संसार का हर प्राणी जीना चाहता है और किसी भी प्राणी का जीवन लेने का अधिकार किसी को भी नहीं है. अन्य प्राणियों की तो छोड़ो आज तो बेटियों की जिंदगी कोख में ही छीनी जा रही है. “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” अर्थात जहाँ नारियों की पूजा की जाती है वहां देवता निवास करते हैं. ऐसा शास्त्रों में लिखा है किन्तु बेटियों की दिनोदिन कम होती संख्या हमारे दौहरे चरित्र को उजागर करती है.

    माँ के गर्भ में पल रही कन्या की जब हत्या की जाती है तब वह बचने के कितने जतन करती होगी यह माँ से बेहतर कोई नहीं जानता. गर्भ में ‘माँ मुझे बचा लो ‘ की चीख कोई खयाली पुलाव नहीं है बल्कि एक दर्दनाक हकीकत है. अमेरिकी पोट्रेट फिल्म एजुकेशन प्रजेंटेशन ‘ The Silent Scream ‘ एक ऐसी फिल्म है जिसमे गर्भपात की कहानी को दर्शाया गया है. इसमें दिखाया गया है कि किस तरह गर्भपात के दौरान भ्रूण स्वयं के बचाव का प्रयास करता है. गर्भ में हो रही ये भागदौड़ माँ महसूस भी करती है. अजन्मा बच्चा हमारी तरह ही सामान्य इंसान है. ऐसे मैं भ्रूण की हत्या एक महापाप है.

    वह नन्हा जीव जिसकी हत्या की जा रही है उनमे से कोई कल्पना चावला, कोई पी. टी. उषा, कोई स्वर कोकिला लता मंगेशकर तो कोई मदर टेरेसा भी हो सकती थी. कल्पना चावला जब अन्तरिक्ष में गयी थी तब हर भारतीय को कितना गर्व हुआ था क्योंकि हमारे भारत को समूचे विश्व में एक नयी पहचान मिली थी. सोचो अगर कल्पना चावला के माता पिता ने भी गर्भ में ही उसकी हत्या करवा दी होती तो क्या देश को ये मुकाम हासिल करने को मिलता ?

    जीवन की हर समस्या के लिए देवी की आराधना करने वाला भारतीय समाज कन्या जन्म को अभिशाप मानता है और इस संकीर्ण मानसिकता की उपज हुयी है दहेज़ रुपी दानव से. लेकिन दहेज़ के डर से हत्या जैसा घ्रणित और निकृष्ट कार्य कहाँ तक उचित है ? अगर कुछ उचित है तो वह है दहेज़ रुपी दानव का जड़मूल से खात्मा. एक दानव के डर से दूसरा दानविक कार्य करना एक जघन्य अपराध है और पाशविकता की पराकाष्ठा है.

    हिंसा का यह नया रूप हमारी संस्कृति और हमारे संस्कारों का उपहास है. नारी बिना सृष्टि संभव नहीं है. ऐसे में बढ़ते लिंगानुपात की वजह से वह दिन दूर नहीं जब 100 लड़कों पर एक लड़की होगी और वंश बेल को तरसती आँखे कभी भी तृप्त नहीं हो पायेगी.
    अवनीत गोयर, भवानी मंडी, राजस्थान

  • भारत में हमेशा देवी और देवता का मान रहा है | पर आज इस महंगाई के ज़माने में लोगो की सोच बदल रही है सामान्तया सभी लोग ऐसा ही सोचने लगे हैं पर हम सब मिलकर बच्चियों की हत्या होने से बचा सकते है. क्योंकि सब से बड़ा कारन दहेज़ प्रथा है जिसके कारन ही मज़बूरन उन गरीब परिवारों को बेटी के जनम में खुसी नही होती जिनके घर आर्थिक रूप से मज़बूत नहीं है, इसलिए दहेज़ देना और लेना दोनों ही बंद करना पड़ेगा वार्ना वो दिन दूर नही जब लड़कियों से शादी करने के लिए आपस में ही लड़ाई और दंगे तथा कई अमानवीय घटनाएँ होंगी|

    इसलिए बच्ची को जीने दे तभी तो आप को बहु घर को माँ भाई को बहन और पति को पत्नी मिलेगी.
    धन्यवाद
    प्रशांत कुमार
    लखनऊ

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