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बेस्ट फिनिशर हैं धोनी : दुनिया बोले माही वे…

बेस्ट फिनिशर हैं धोनी : दुनिया बोले माही वे…

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भारतीय क्रिकेट टीम के कैप्टन मिस्टर कूल यानी महेंद्र सिंह धोनी की मैच फिनिशिंग स्किल के सभी कायल हो गए हैं. सभी इस बात से अब इत्तेफाक रखने लगे हैं कि जब तक धोनी क्रीज पर हैं,भारत को डरने की जरूरत ही नहीं है…

 

माही, यानी भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी आज उस मुकाम पर हैं, जिसे हासिल करने में बड़ों-बड़ों के दांत खट्टे हो जाते हैं. उनके तरकश में आज एक से बढ़कर एक तीर हैं. दरअसल, वह यह बखूबी जानते हैं कि किस तीर से कब और कहां निशाना साधना है. और इसी काबिलियत की वजह से धोनी को न सिर्फ भारत का बेस्ट कैप्टन कहा जाता है, बल्कि वह दुनिया के सबसे बड़े मैच फिनिशर भी बन गए हैं. कभी एडम गिलक्रिस्ट की तरह विस्फोटक बल्लेबाजी करने वाले धोनी ने वनडे क्रिकेट में टीम की जरूरत के लिए माइकल बेवन बनने से भी परहेज नहीं किया. यही खूबी उन्हें एक असाधारण वनडे बल्लेबाज बनाती है. वह एक गेंद में गिलक्रिस्ट की तरह छक्के लगाकर मैच जिता सकते हैं, तो अगली ही गेंद पर बेवन की चपलता से ब़डे आसानी से सिंगल्स भी चुरा सकते हैं.

धोनी ने टीम इंडिया को शिखर पर पहुंचा दिया है. आज टीम इंडिया वनडे रैंकिंग में नंबर वन है, तो वहीं टेस्ट में दूसरे और टी-ट्वेंटी में तीसरे स्थान पर है. धोनी की अगुवाई में भारतीय टीम ने 2007 में ट्वेंटी-20 विश्‍व कप, 2011 में वन डे वर्ल्ड कप और 2013 में चैम्पियंस ट्रॉफी अपने नाम की है. धोनी की मैच जिताऊ पारियों के कारण ही पूर्व भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी वीवीएस लक्ष्मण कहते हैं कि भारत लकी है कि उसके पास धोनी जैसा कैप्टन है. धोनी बहुत ही शांत एवं धैर्यवान कप्तान हैं और वह भारतीय टीम को एकदम सही तरीके से संचालित कर रहे हैं.

देखा जाए, तो धोनी छक्का लगाकर मैच जिताने में माहिर हैं. उन्होंने कई बार विषम परिस्थितियों में भी छक्का मारकर मैच जिताए हैं. हाल ही में वेस्टइंडीज में त्रिकोणीय सीरीज के फाइनल और विश्‍व कप 2011 में श्रीलंका के खिलाफ धोनी ने फाइनल में छक्का मारकर टीम को विश्‍व विजेता बनाया था. वेस्टइंडीज में श्रीलंका के खिलाफ हुए फाइनल मैच में यह साबित हो गया कि वह भारत के सबसे बढ़िया फिनिशर हैं. अगर आज के क्रिकेट की बात की जाए, तो  फिलहाल दुनिया में ऐसा कोई भी बल्लेबाज नहीं है, जो उनसे अच्छा मैच फिनिशर हो. इंग्लैंड के इयोन मोर्गन, लंका के मैथ्यूज, इंडीज के पोलार्ड, ऑस्ट्रेलिया के माइकल कलार्क, दक्षिण अफ्रीका के जे.पी डुमिनी, पाकिस्तान के शाहिद अफरीदी मैच खत्म करने में उनसे कहीं पीछे हैं. धोनी की यही काबिलियत है कि अगर भारत के 9 विकेट गिर चुके हैं और क्रीज पर महेंद्र सिंह धोनी हैं, तब भी उम्मीद रहती है कि भारत मैच जरूर जीत लेगा. हालांकि धोनी जब टीम इंडिया में आए थे, तो कई विशेषज्ञों का मानना था कि उनकी बल्लेबाजी में तकनीकी खामियां हैं, लेकिन आज धोनी दुनिया में सबसे भरोसेमंद फिनिशर के तौर पर उभर चुके हैं. गौरतलब है कि मिस्टर भरोसेमंद का तमगा इससे पहले पूर्व क्रिकेटर राहुल द्रविड़ को दिया जाता था, जो तकनीकी रूप से विश्‍व के नंबर एक बल्लेबाज थे.

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पूर्व भारतीय कप्तान और मुख्य चयनकर्ता दिलीप वेंगसरकर मानते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में झारखंड के इस क्रिकेटर से बेहतर फिनिशर नहीं देखा है. वेंगसरकर कहते हैं कि धोनी का मिजाज बहुत बढ़िया है, अब तक मैंने जितने भी फिनिशर देखे हैं, उनमें वह सर्वश्रेष्ठ है. वह खेल में किसी भी स्थिति में घबराता नहीं है. धोनी के कायल लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर भी हैं. वे कहते हैं कि धोनी क्या चीज हैं, इसे समझ पाना असंभव है. उनके करीबी दोस्त मानते होंगे कि वह उन्हें जानते हैं, लेकिन मेरी समझ से वह उन्हें बिल्कुल नहीं जानते. असल में धोनी क्या हैं, यह किसी को नहीं पता.

धोनी को ट्वेंटी-20 मैचों का शानदार फिनिशर माना जाता है. अब उन्होंने यह भी दिखा दिया है कि वह 50 ओवर के मैचों में लक्ष्य का पीछा करने के दौरान डेथ ओवर में कितने योग्य हैं. विपरीत परिस्थितियों में धोनी के चेहरे पर शांति, जरूरत के मुताबिक, रणनीति में बदलाव तथा विपक्षी गेंदबाजों और कप्तानों को पढ़ने की क्षमता, उनकी सफलता के महत्वपूर्ण कारक रहे हैं. उन्होंने 226 वन डे में आठ शतक, 48 अर्धशतकों से 7,300 रन बनाए हैं. दरअसल इस महान फिनिशर की क्षमता का पता इस बात से ही चल जाता है कि वह प्रत्येक चार पारियों में एक बार नाबाद रहते हैं, लेकिन धोनी के लिए यह ऊंचाई हासिल करना इतना आसान नहीं था.

धोनी ने 2004-05 में बांग्लादेश के खिलाफ टीम इंडिया का सदस्य बनकर अपने करियर का आगाज किया था, लेकिन यह उनकी बहुत ही खराब शुरुआत रही थी. मैच में रांची का यह खिलाड़ी शून्य पर रन आउट हो गया था, लेकिन इसके बाद धोनी के करियर का ग्राफ चढ़ता ही चला गया और वह इस समय देश ही नहीं, विश्‍व के सबसे महान क्रिकेटरों में से एक हैं. धोनी का क्रिकेट में आना एक संयोग था, क्योंकि क्रिकेट धोनी की पहली पसंद नहीं था. कहा जाता है कि वह फुटबॉल और बैडमिंटन के शौकीन थे. एक बार धोनी के फुटबॉल कोच ने धोनी को एक क्रिकेट क्लब के लिए विकेट कीपिंग करने को कहा और उसके बाद फिर जो हुआ, उसके बारे में शायद धोनी ने कभी सोचा नहीं होगा. ऐसा भी नहीं है कि धोनी को सब कुछ आसानी से हासिल हो गया. उन्होंने इसके लिए कड़ी मेहनत की है. धोनी सबसे पहले 1998-99 में बिहार अंडर-19 टीम में शामिल किए गए. 1998-1999 के दौरान कूच बिहार ट्रॉफी से धोनी के क्रिकेट को पहली बार पहचान मिली. इस टूर्नामेंट में धोनी ने 9 मैचों में 488 रन बनाए और विकेट कीपिंग करते हुए 7 स्टंपिंग भी कीं. इसी प्रदर्शन के बाद उन्हें साल 2000 में पहली बार रणजी में खेलने का मौका मिला. इस तरह 18 साल के धोनी ने बिहार की टीम से रणजी में खेलना शुरू किया. इस दौरान 2003-04 में कड़ी मेहनत के कारण धोनी को जिम्बाब्वे और केन्या दौरे के लिए भारत ए टीम में चुना गया. जिम्बाब्वे के खिलाफ उन्होंने विकेटकीपर के तौर पर बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 7 कैच और 4 स्टंपिंग की. इस दौरे पर बल्लेबाजी करते हुए धोनी ने 7 मैचों में 362 रन भी बनाए.

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धोनी के कामयाब जिम्बाब्वे दौरे के बाद तत्कालीन टीम इंडिया के कप्तान सौरव गांगुली ने उन्हें टीम में लेने की सलाह दी. 2004 में धोनी को पहली बार टीम इंडिया में जगह मिली. हालांकि वह अपने पहले मैच में कोई खास कमाल नहीं कर पाए और शून्य पर आउट हो गए. इसके बावजूद कई औरमैचों में धोनी का बल्ला नहीं चला. 2005 में पाकिस्तान के खिलाफ खेलते हुए धोनी ने 123 गेंदों पर 148 रनों की एक ऐसी तूफानी पारी खेली कि सभी इस खिलाड़ी के मुरीद बन गए.

वर्ष 2005 में धोनी भारतीय टीम में नये-नये थे और उन्होंने तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी करते हुए महज 145 गेंद में नाबाद 183 रन का स्कोर बनाया था, जो कि अब तक का उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर है, जिसमें 10 छक्के और 15 चौके शामिल थे. इस पारी से भारत ने श्रीलंका द्वारा दिए गए 299 रन के लक्ष्य को चार ओवर रहते ही हासिल कर लिया था, जबकि उनकी टीम में उनके सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज चामिंडा वास और मुथैया मुरलीधरन शामिल थे.

इससे कुछ महीने पहले ही धोनी ने विशाखापत्तनम में पाकिस्तान के खिलाफ 123 गेंद में 148 रन की पारी खेलकर अपनी  काबिलियत का नजारा पेश किया था, जिससे भारत ने नौ विकेट पर 356 रन का स्कोर खड़ा किया और मेहमान टीम हार गई थी. धोनी ने पाकिस्तान में 2006 में लाहौर और कराची में जोरदार अंदाज में फिनिशर की भूमिका अदा की, जिसमें नाबाद 70 से अधिक रन की पारी शामिल थी, जिससे भारत ने टेस्ट सीरीज में 0-1 की हार के बाद वन डे सीरीज में 4-1 से जीत दर्ज की.

उन्होंने बांग्लादेश में मई में 2007 और फिर जनवरी 2010 में क्रमश: नाबाद 91 और नाबाद 101 रन की पारी खेलकर यह काम फिर से किया. इन कुछ पारियों में धोनी को युवराज सिंह, विराट कोहली तथा अन्य खिलाड़ियों का साथ मिला और वेस्टइंडीज में लंका के खिलाफ उन्होंने अंतिम खिलाड़ी इशांत शर्मा के साथ यही किया. इन सबमें सबसे ज्यादा चर्चित और अहम पारी वानखेड़े स्टेडियम में श्रीलंका के खिलाफ 2 अप्रैल, 2011 विश्‍व कप फाइनल की रही, जिसमें उन्होंने नाबाद 91 रन बनाए.

सलामी बल्लेबाज गौतम गंभीर की 97 रन की शानदार पारी और धोनी की उनके  साथ 119 रन की साझेदारी तथा कप्तान की युवराज सिंह के साथ नाबाद 54 रन की भागीदारी से भारत ने 10 गेंद रहते श्रीलंका द्वारा दिए गए 275 रन के लक्ष्य को हासिल कर लिया था. धोनी ने तेज गेंदबाज नुवान कुलाशेखरा की गेंद पर विजयी छक्का लगाकर पूरे देश को जश्‍न के माहौल में डुबो दिया.

भारत के पूर्व फिरकी गेंदबाज मनिंदर सिंह कहते हैं कि धोनी न केवल भाग्य के धनी हैं, बल्कि उनमें गुण भी बहुत हैं. वह क्रिकेट के अच्छे जानकार हैं. वह निर्भीक होकर बल्लेबाजी, विकेटकीपिंग और कप्तानी करते हैं. उनके कुछ फैसले बेहद चौंकाने वाले होते हैं. उनकी सोच है कि जब तक मैं सौ प्रतिशत दे रहा हूं, तब तक चाहे कोई भी मेरी कितनी ही आलोचना करे, मुझे कोई डर नहीं है. जब किसी खिलाड़ी का रवैया इस तरह का हो जाए, तो परिणाम भी सकारात्मक या फिर मन मुताबिक आने शुरू हो जाते हैं. साथ ही युवा खिलाड़ियों को जिस अंदाज में वह साथ लेकर चलते हैं या मैदान में उनका उपयोग करते हैं, वह भी काबिलेतारीफ है. युवा खिलाड़ियों को एक ऐसा कप्तान चाहिए, जो उन पर भरोसा कर सके, उन पर दबाव न आने दे और जब कप्तान निडर होगा, तो टीम भी वैसी ही होगी, जैसी इस समय भारतीय टीम दिख रही है.

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पोर्ट ऑफ स्पेन वन-डे में धोनी की एक और मैच-जिताने वाली पारी के बाद एक बार फिर यह बहस शुरू हो गई है कि क्या धोनी वास्तव में बेस्ट फिनिशर हैं. आंकड़े देखें, तो यह साबित होता है कि धोनी को क्यों बेस्ट फिनिशर कहा जाता है. सबसे पहले बात करते हैं सचिन तेंदुलकर की. सचिन के 463 वनडे मैचों में 18426 रन, 44.83 का औसत, 86.23 का स्ट्राइक रेट, 49 शतक और 96 अर्धशतक उनको भारत तो क्या, दुनिया की किसी भी सर्वकालीन महान वन डे टीम का हिस्सा बनाने के लिए काफी हैं, लेकिन इन आंकड़ों और रिकॉर्ड से बड़ी बात यह है कि तेंदुलकर के दौर में टीम इंडिया के वनडे मैचों के जीतने का अनुपात बढ़ा और यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है. इतना ही नहीं, तेंदुलकर ने दुनिया के हर मैदान पर, हर विरोधी के खिलाफ करीब 2 दशक से ज्यादा समय तक अपने आप को मैच विनर साबित किया.

सौरव गांगुली की गिनती भारत के सफलतम कप्तानों में होती है. आकंड़ों और शतक के लिहाज से गांगुली की दावेदारी वन डे क्रिकेट में सबसे बड़े मैच-विनर के तौर पर तेंदुलकर की तुलना में उन्नीस ही है.  311 मैचों में 11363 रन, 41.02 का औसत, 73.70 का स्ट्राइक रेट, 22 शतक और 72 अर्धशतक, दादा को भारतीय क्रिकेट का एक बेजोड़ मैच-विनर बनाते हैं, लेकिन बात सिर्फ एक खिलाड़ी की चुनने की आए, तो शायद दादा के समर्थक भी मानेंगे कि सचिन, युवराज और धोनी उनसे इस मामले में आगे हैं.

युवराज सिंह की गिनती भी भारत के बेस्ट मैच फिनिशरों में होती है. अगर 2011 के वर्ल्ड कप को देखें, तो युवराज सिंह का योगदान साबित करता है कि वन डे क्रिकेट में एक मिडिल ऑर्डर बल्लेबाज, एक उपयोगी गेंदबाज और एक लाजवाब फील्डर के तौर पर वे जबरदस्त मैच विनर हैं. युवराज के 282 मैचों में 8211 रन और 36.98 का औसत, 87.64 का स्ट्राइक रेट, 13 शतक और 50 अर्धशतक के आंकड़े भले ही तेंदुलकर और गांगुली की तुलना में थोड़े कमजोर दिखें, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि युवराज ने सिर्फ अपने दम पर कई मैचों का रुख बदला है. आंकड़ों के लिहाज से करियर के इस दौर में धोनी का औसत स्ट्राइक रेट की कसौटी पर तेंदुलकर से भी बेहतर है. धोनी के 226 मैचों में 7358 रन, 51.45 का औसत, 88.17 का स्ट्राइक रेट, 8 शतक और 48 अर्धशतक, अपने आप में अद्भुत आंकड़े हैं. आज भारत के किसी भी फॉर्मेट (टेस्ट वनडे और ट्वेंटी-ट्वेंटी) में धोनी का रिकॉर्ड भारत के पूर्व कप्तानों पर भारी पड़ता हुआ दिखाई देता है.

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