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विवादों कि आत्मकथाएं
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विवादों कि आत्मकथाएं

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क्या आत्मकथाएं प्राय: विवादों का पुलिंदा होती हैं? आजकल छप रहीं आत्मकथाओं में विवादों को जगह मिलती ही है या कहें कि प्रकाशक उन्हीं आत्मकथाओं को छापने और ऊंची से ऊंची कीमत देने के लिए तैयार होते हैं , जिनमें विवादों को पर्याप्त जगह मिली हो. अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के साथ अवैध संबंध रखने वाली मोनिका लेवेंस्की की आत्मकथा को छापने के लिए हजारों पब्लिशर तैयार थे. यह असर खिलाड़ियों की आत्मकथाओं में भी दिखाई देता है. इसलिए विवादित प्रकरण इस दौर में लिखी जाने वाली आत्मकथाओं का मुख्य हिस्सा बन गए हैं. इसे मार्केटिंग स्ट्रैटजी कहा जाए या कुछ और, लेकिन इससे आत्मकथाओं की विश्‍वसनीयता पर सवाल तो जरूर खड़ा होता है.

 

आत्मकथा का मतलब होता है लिखने वाले की अपनी वह कहानी जो अब तक अनकही है, जिसमें अनायास ही आत्मकथा लिखने वाले व्यक्ति के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग शामिल हो जाते हैं. आत्मकथा में लेखक एक तरफ तो अपने जीवन का आकलन करता है, लेकिन दूसरी तरफ उनके जीवन में घटित कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं का अपने नजरिये से उल्लेख करता है, लेकिन सामान्य तौर पर किसी सेलिब्रिटी या कहें कि विशिष्ट व्यक्ति की आत्मकथा में विवादों का पुट आवश्यक रूप से होता है. वे अपनी आत्मकथाओं में उन घटनाओं का जिक्र जरूर करते हैं. विशिष्ट लोगों की किसी विवादित मुद्दे पर राय जानने में लोगों की विशेष रुचि होती है. इन्हीं विवादों की वजह से बाजार में किताबों की मांग होती है. गांधीजी ने अपनी आत्मकथा माइ एक्सपेरीमेंट विद ट्रुथ में अपनी कमजोरियों या कहें उन पहलुओं का जिक्र किया है, जिनपर सामान्य तौर पर कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता है, लेकिन आजकल लिखी जाने वाली आत्मकथाओं, खासकर खिलाड़ियों द्वारा लिखी जाने वाली आत्मकथाओं में विवादों का पुट कुछ ज्यादा ही नजर आता है.

आजकल पूर्व ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट कप्तान रिकी पोंटिंग की आत्मकथा एट द क्लोज ऑफ प्ले सुर्खियों में है. सुर्खियों का कारण पोंटिंग की लेखन शैली या क्रिकेट के भविष्य को लेकर प्रकट किए गए उनके विचार नहीं हैं, बल्कि 2007-08 में भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान उपजे मंकीगेट प्रकरण पर सचिन तेंदुलकर की भूमिका है. इस प्रकरण में हरभजन सिंह पर ऑस्ट्रेलियाई ऑलराउंडर एंड्रयू सायमंड्स के ऊपर नस्लभेदी टिप्पणी करने का आरोप लगा था. हरभजन पर आरोप था कि उन्होंने सायमंड्स को मंकी (बंदर) कहकर पुकारा था. इस प्रकरण पर पोंटिंग ने लिखा है कि मैच रेफरी माइक प्रॉक्टर के समक्ष इस मामले की सुनवाई के दौरान सचिन ने कुछ नहीं कहा था, लेकिन आईसीसी द्वारा नियुक्त न्यूजीलैंड के जज जॉन हेनसन के सामने सुनवाई के दौरान सचिन ने हरभजन द्वारा हिन्दी भाषा में कुछ कहने वाला बयान दिया था. मेरी समझ में यह नहीं आया कि सचिन ने सुनवाई के दौरान हरभजन का साथ क्यों दिया? वह मैच रेफरी द्वारा हरभजन को निलंबित करने के दौरान चुप क्यों थे? इस प्रकरण के कारण भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट संबंधों के खराब होने का खतरा उत्पन्न हो गया था. भारतीय टीम द्वारा ऑस्ट्रेलियाई दौरा बीच में ही छोड़कर स्वदेश वापसी की अटकलें लगने लगीं थीं. इस बारे में पोंटिंग ने लिखा कि शायद 21वीं सदी की शुरुआत में भारतीय क्रिकेट का इतना दबदबा हो गया था कि उसे हिलाया नहीं जा सकता था, लेकिन फिर मैंने सोचा कि किस तरह से खेल में कई लोगों ने हमारी मंशा पर सवाल उठाए? कैसे उन्होंने सोचा कि हम उसूलों पर काम करने की बजाय श्रृंखला में फायदा लेना चाहते हैं? उन्होंने कहा कि तत्कालीन भारतीय कप्तान अनिल कुंबले के इस बयान ने ऑस्ट्रेलियाई टीम की छवि खराब कर दी कि ऑस्ट्रेलिया ने खेलभावना से नहीं खेला. कुंबले के इस बयान को काफी तवज्जो मिली. बाद में यह धारणा तेजी से बन गई कि विवाद प्रॉक्टर के निर्णय से नहीं, बल्कि हमारी वजह से पैदा हुआ. सचिन के ऊपर इस प्रकरण पर ठीक ऐसा ही आरोप पूर्व ऑस्ट्रेलियाई विकेटकीपर-बल्लेबाज एडम गिलक्रिस्ट ने भी आत्मकथा ट्रू कलर्स में लगाया था. गिलक्रिस्ट ने लिखा कि ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी खेल के मैदान पर उभरे तनावों को पीछे छोड़ आते हैं, जबकि सचिन और हरभजन सिंह जैसे भारतीय खिलाड़ी तनाव को ड्रेसिंग रूम तक ले जाते हैं. उन्होंने सचिन की ईमानदारी पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि मंकीगेट प्रकरण के दौरान उन्होंने अपना बयान पूरी तरह बदल दिया था.

पोंटिंग की आत्मकथा में उठे सवालों के जवाब में उस समय के भारतीय कप्तान अनिल कुंबले ने कहा कि वह अपनी आत्मकथा में मंकीगेट विवाद की सच्चाई सामने लेकर आएंगे. इसका मतलब तो साफ है कि कुंबले भी अपनी आत्मकथा को बेस्टसेलर बनाना चाहते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो कुंबले उस प्रकरण से जुड़ी सारी बातों का खुलासा अभी कर सकते थे, लेकिन सच्चाई जानने के लिए लोगों को उनकी आत्मकथा के प्रकाशित होने तक इंतजार करना पड़ेगा.

पोंटिंग की आत्मकथा में उठे सवालों के जवाब में तात्कालीक भारतीय कप्तान अनिल कुंबले ने कहा कि वह अपनी आत्मकथा में मंकीगेट विवाद की सच्चाई सामने लेकर आएंगे. इसका मतलब तो साफ है कि कुंबले भी अपनी आत्मकथा को बेस्टसेलर बनाना चाहते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो कुंबले उस प्रकरण से जुड़ी सारी बातों का खुलासा अभी कर सकते थे, लेकिन सच्चाई जानने के लिए लोगों को उनकी आत्मकथा के प्रकाशित होने तक इंतजार करना पड़ेगा. इस तरह कुंबले की आत्मकथा प्रकाशित होने से पहले ही सुर्खियों में आ गई है और इसके लिए बाजार भी बन गया है. देरी तो बस किताब के बाजार में आने की है.

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खिलाड़ी जब तक मैदान में अपना हुनर दिखा रहा होता है, तब तक बाजार में उसकी मांग होती है, लेकिन संन्यास लेते ही लोग नये सितारे तलाश लेते हैं. अगर वो विवादों को फिर से हवा न दें तो उनकी किताबों को कुछ खेल प्रशंसकों और समीक्षकों के अलावा कोई नहीं खरीदेगा. शायद इसीलिए खिलाड़ी विवादों को हवा देने और किसी समकालिक श्रेष्ठ खिलाड़ी पर उंगली उठाने से भी नहीं चूकते. जिस तरह विवादों में रहने वाले पाकिस्तान के तेज़ गेंदबाज शोएब अख्तर ने अपनी आत्मकथा कंट्रोवर्शियली योर्स में लिखा कि सचिन तेंदुलकर उनसे डरते थे. और राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर मैच विनर्स नहीं हैं. इसके साथ ही शोएब ने यह स्वीकार किया कि वे गेंद से छेड़छाड़ करते थे. इसके अलावा भी अन्य कई मुद्दे शोएब की इस किताब में विवादास्पद थे. इस किताब के विवादों में घिरने के बाद पाकिस्तान के पूर्व कप्तान आमिर सोहेल ने कहा, देखिए, अगर कोई विवाद नहीं होता तो आत्मकथा नहीं बिकती और यह बिल्कुल साफ है कि शोएब इस बात से वाकिफ हैं. इसी तरह पाकिस्तान के पूर्व कप्तान और राजनीतिज्ञ इमरान खान ने अपने कैंसर अस्पताल को पूरा करने के लिए अपनी आत्मकथा की लेखिका के समक्ष मैच के दौरान गेंद के साथ छेड़छाड़ करने की बात का खुलासा करने बहुत पैसे बटोरे थे. पूर्व ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर ग्रेग चैपल ने भारतीय टीम के कोच के रूप में काम करने का अनुभव अपनी आत्मकथा फियर्स फोकस में लिखा है. उन्होंने सौरव गांगुली को सिरदर्द बताकर इसे हिट बनाने की कोशिश की थी. चैपल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि भारतीय टीम में ऐसा वर्गीकरण था कि युवा खिलाड़ी सीनियर खिलाड़ियों के सामने टीम बैठक में बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे. युवा खिलाड़ी कहते थे कि मैं उन खिलाड़ियों के सामने नहीं बोल सकता. अगर मैं सीनियर खिलाड़ी के सामने बोलूंगा तो वे हमेशा इसे मेरे खिलाफ अपने दिल में बैठा लेंगे. कुछ डरे हुए थे और उदाहरण के लिए अगर किसी बैठक में तेंदुलकर ने कुछ बोला है तो वह कुछ भी बोलने से साफ इंकार कर देते थे.

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दक्षिण अफ्रीका के पूर्व प्रारंभिक बल्लेबाज हर्शल गिब्स ने आत्मकथा टू द प्वॉइंट में अपनी टीम के खिलाड़ियों और अधिकारियों पर बहुत से गंभीर आरोप लगाए थे. गिब्स ने उसमें अपने निजी जीवन के बारे में कई बेबाक और सनसनीखेज खुलासे किए थे. इसके साथ ही उन्होंने अपने साथी खिलाड़ियों के निजी जीवन के बारे में टिप्पणियां कर क्रिकेट जगत में बवाल मचा दिया था. उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी टीम के प्रदर्शन में गिरावट के लिए खिलाड़ियों द्वारा मादक पदार्थों के सेवन को जिम्मेदार ठहराया था. साथ ही गिब्स ने इस बात का भी खुलासा किया कि दिसंबर 1997 से जनवरी 1998 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर हर रात हमारे साथ महिलाएं होती थीं.

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व सलामी बल्लेबाज मैथ्यू हेडन ने अपनी आत्मकथा स्टैंडिंग माइ ग्राउंड में लिखा कि 2004 में ऑस्ट्रेलियाई टीम के भारत दौरे में नागपुर की घासवाली पिच देख गांगुली और हरभजन डर के मारे टीम से बाहर हो गए थे. हेडन ने इस बात पर भी आश्‍चर्य जताया है कि कैसे मैच से ठीक पहले हरभजन को फूड प्वॉइजनिंग हो गई. इस मैच में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को जबरदस्त शिकस्त दी थी.

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दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कोच मिकी ऑर्थर ने अपनी आत्मकथा टेकिंग द मिकी-द इन साइड स्टोरी में लिखा कि मखाया एंटिनी को 2008-09 में जब उनकी खराब फॉर्म को लेकर राष्ट्रीय टीम से बाहर किया गया था, उस समय एंटिनी ने मेरे अलावा टीम के कप्तान ग्रीम स्मिथ पर नस्लभेदी होने का आरोप लगाया था. जब एंटिनी को टीम से बाहर किया गया था, उस समय टीम के सभी खिलाड़ी खासतौर पर वरिष्ठ खिलाड़ी काफी निराश थे, मैं इसलिए ज्यादा निराश था, क्योंकि मखाया प्रभावशाली प्रशासकों से यह कह रहे थे कि मैं और ग्रीम स्मिथ टीम में काले खिलाड़ियों को टीम में नहीं लेना चाहते थे.

पिछले कुछ सालों में क्रिकेट पर जितनी किताबें आई हैं, चाहे वह किसी भी क्रिकेट हस्ती द्वारा लिखी गई हों, उसमें टीम इंडिया, बीसीसीआई और भारतीय क्रिकेटर्स को पर्याप्त स्थान मिला है. इससे यह बात तो पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि भारत विश्‍व क्रिकेट की धुरी बन चुका है. भारत में जितने क्रिकेट प्रशंसक हैं, उतने दुनिया के अन्य किसी देश में नहीं हैं. इसलिए लेखक और प्रकाशक की नज़र भारत पर होती है. इसलिए क्रिकेटरों द्वारा लिखी किताबों में भारत से जुड़े विवादों का जिक्र जरूर होता है. भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व मुख्य चयनकर्ता दिलीप वेंगसरकर भी ऐसा ही मानते हैं कि क्रिकेटर्स जिस तरह अपनी किताबों में भारतीय क्रिकेटरों को निशाना बनाते हैं, वो विशुद्ध रूप से केवल मार्केटिंग फंडा के कारण ही होता है.

आत्मकथा लिखने के लिए किसी भी तरह की शैक्षणिक योग्यता का बंधन ठीक उसी तरह नहीं है, जिस तरह हमारे सांसद या विधायक बनने के लिए नहीं है. जीवन सबसे बड़ी पाठशाला है, जो अपने कटु अथवा मीठे अनुभवों से बहुत कुछ सिखा देती है. अगर जीवन के अनुभवों को पूरी ईमानदारी के साथ लोगों के समक्ष नहीं परोसा गया तो आत्मकथाओं को लोग काल्पनिक कथाओं के रूप में लेने लगेंगे, जैसा कि लांस ऑर्मस्ट्रांग ने अपनी आत्मकथा में डोपिंग के बारे में कुछ नहीं कहा. लेकिन कुछ महीने पहले उनके डोपिंग में लिप्त पाए जाने के बाद उनके सारे खिताब वापस ले लिए गए. वह एक ही पल में हीरो से जीरो हो गए.

वास्तव में कथा सबकी बनती है, लेकिन उस कथा का असल मायने तब सामने आता है, जब उसे सार्वजनिक रूप दिया जाता है. तब असली चुनौती तो यही है कि क्या बताएं और क्या छुपाएं. बताएं तो किस तरह, छुपाएं तो किस तरह. इस मुश्किल की सीमा तब और ब़ढ जाती है, जब बताने और छुपाने का पैमाना पाठक नहीं, बाजार बन जा रहा है. इस हकीकत को फ्रांसीसी समाजशास्त्री लियोटार्ड के माध्यम से और बेहतर समझा जा सकता है, जब वे कहते हैं कि बाजारीकरण उत्तर आधुनिक समाज की वह हकीकत है, जिसमें विवाद बिकता है, सवांद नहीं.

 

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