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अलविदा : सचिन रिकॉर्ड तेंदुलकर

1989 में कराची में पाकिस्तान के खिलाफ सचिन ने अपना पहला टेस्ट खेला. यह वह दौर था जब बर्लिन की दीवार गिराई जा रही थी. मार्गेट थ्रेचर इंग्लैंड की प्रधानमंत्री थीं. सोवियत संघ विघटित नहीं हुआ था. अमेरिकी राष्टपति बराक ओबामा हॉवर्ड लॉ स्कूल में दाखिला ले रहे थे. पीट सैंप्रास ने एक भी ग्रैंड स्लैम नहीं जीता था. माइकल शूमाकर ने फॉर्मूला वन करियर की शुरुआत भी नहीं की थी. देश में राजीव गांधी सरकार को सत्ता से बेदखल कर पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह पहली अल्पमत की सरकार बना रहे थे. देश की अर्थव्यवस्था को खोलने की प्रक्रिया शुरू तक नहीं हुई थी. दूरदर्शन इकलौता टीवी चैनल था. हमारी जिंदगी में मोबाइल शामिल नहीं हुआ था और लोगों के फोन पड़ोस में आते थे. मौजूदा भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी सिर्फ आठ साल के थे. 1989 से 2013 तक इन 24 सालों में देश और दुनिया ने कई करवटें बदलीं. लेकिन सचिन तेंदुलकर नहीं बदले. 11 साल की उम्र में क्रिकेट सचिन की जिंदगी का हिस्सा बना और 24 साल के इस मैरथन सफर में सचिन ने क्रिकेट को सभी की जिंदगी का हिस्सा बना दिया.  इसीलिए संन्यास की घोषणा करते हुए सचिन ने कहा कि  मैं बिना क्रिकेट के कैसे जिंदा रहूंगा?

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मैचपारीरनऔसतशतकअर्धशतक उच्चतम
टेस्ट1983271583753.865167248*
वन-डे4634521842644.834996200*
टी-209696279732.90116100*

सब धरती कागद करूं, लेखन सब बनराय, सात समुद्र की मसि करूं, सचिन गुन लिखा न जाए. सारी धरती को कागज़ कर दूं, और दुनिया की सारे पे़डों को लेखनी बना लूं और सातों समुद्र को स्याही की तरह उपयोग में लाऊं, बावजूद इसके सचिन के गुणों और रिकॉर्डों का बखान करने में सब कुछ कम पड़ जाएगा. क्रिकेट के भगवान माने जाने वाले सचिन रमेश तेंदुलकर ने आखिरकार क्रिकेट को अलविदा कह दिया. सचिन एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने क्रिकेट खेला नहीं उसे जिया. शायद उस दिन क्रिकेट खुद सबसे ज्यादा दुःखी होगा, जब उसका सबसे प्यारा लाड़ला आखिरी बार मैदान पर अपने बल्ले का हुनर दिखाने उतरेगा. उसके बाद यह बहस होनी बंद हो जाएगी कि सचिन टीम में शामिल हों या न हों या उम्र अब सचिन पर भारी हो रही है. लेकिन इस बात को लेकर किसी बहस की उम्मीद नहीं की जा सकती है कि जब भी पूरे विश्व में क्रिकेट का जिक्र किया जाएगा निर्विवाद रूप से सचिन की तस्वीर सबसे पहले उभर आएगी. आज से 24 साल पहले वर्ष 1989 में महज 15 साल की उम्र में टेस्ट पदार्पण करना किसी अजूबे से कम नहीं था. लेकिन आज 24 साल बाद वह छोटे कद का खिलाड़ी अपने अंतरराष्ट्रीय करियर को 200 वां टेस्ट मैच खेलने का विश्‍व कीर्तिमान बनाकर अलविदा कहने जा रहा है. निश्‍चित तौर पर यह दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों खासकर सचिन के प्रशंसकों के लिए सबसे निराशा भरा दिन होगा.

सालों भारतीय टीम को वन मैन आर्मी के रूप में जाना गया. पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान मार्क टेलर के शब्दों में कहें तो हम भारत कहलाने वाली टीम से नहीं हारे, बल्कि हम सचिन नाम के शख्स से हारे. सचिन सालों, अकेले अपने कंधों पर एक अरब भारतीयों की आशाओं का बोझ लिए चलते रहे और भारतीय क्रिकेट को सुनहरे लम्हे देते रहे. आज उनके नाम क्रिकेट में बल्लेबाजी के अधिकांश रिकॉर्ड दर्ज हैं. एक बार सचिन के खेल की तारीफ करते हुए जिंबाब्वे के पूर्व कप्तान एंडी फ्लावर ने कहा था कि दुनिया में दो तरह के बल्लेबाज़ हैं, पहला सचिन तेंदुलकर और दूसरा अन्य. इसी तरह सचिन को भगवान मानने वाले खिलाड़ियों की भी कमी नहीं है ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रारंभिक बल्लेबाज मेथ्यू हेडेन ने कहा था कि मैंने भगवान को देखा है और वह भारत के लिए टेस्ट मैंचों में नंबर चार पर बल्लेबाज़ी करता है. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक बार कहा कि मैं क्रिकेट के बारे में कुछ नहीं जानता हूं, बावजूद इसके मैं सचिन को खेलता देखता हूं. इसलिए नहीं कि मैं सचिन का खेल पसंद करता हूं बल्कि इसलिए क्योंकि मैं यह जानना चाहता हूं कि जब सचिन बल्लेबाज़ी कर रहे होते हैं तो हमारे देश के उत्पादन में पांच प्रतिशत की गिरावट क्यों आती है? आम हो या खास हर कोई सचिन को बहुत प्यार करता है. किसी को सचिन में एक संपूर्ण खिलाड़ी नजर आता है, तो किसी को एक अच्छा इंसान. शायद इसी वजह से क्रिकेट के सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में से एक ब्रायन लारा अपने बेटे को सचिन तेंदुलकर बनाना चाहते हैं.

पिछले साल दिसंबर में सचिन ने पाकिस्तान के खिलाफ होने वाली एक दिवसीय सीरीज के पहले बीसीसीआई को पत्र लिखकर एकदिवसीय क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा कर दी थी. तब सचिन ने ऐसा करके अपने प्रशंसकों को निराश किया था. लोग अपने हीरो को पर एक बेहतरीन विदाई देना चाहते थे. लेकिन इस बार सचिन ने पहले ही अपने संन्यास की घोषणा कर दी है. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपने अंतिम दिन की घोषणा करते हुए सचिन ने कहा कि मैंने अपने पूरे जीवन में देश के लिए क्रिकेट खेलने का सपना देखा था. पिछले 24 वर्षों में मैं रोजाना इसी सपने के साथ जिया. मेरे लिए इस बात की कल्पना करना भी बहुत मुश्किल है कि क्रिकेट के बिना मेरा जीवन कैसा होगा. मेरे लिए क्रिकेट के बिना खुद को महसूस कर पाना भी बहुत मुश्किल होगा क्योंकि 11 वर्ष की उम्र से मैं यही करता आ रहा हूं. पूरी दुनिया में क्रिकेट खेलते हुए अपने देश का प्रतिनिधित्व करना मेरे लिए गौरव की बात रही है. इतने सालों में बीसीसीआई से मुझे जो कुछ मिला है, उसका मैं बहुत आभारी हूं. उसने मुझे वह फैसला लेने की इजाजत दी है जो मेरा दिल कह रहा है. मैं अपने परिवार का उनके धैर्य और समझ के लिए शुक्रिया अदा करता हूं. मैं अपने प्रशंसकों और शुभचिंतकों का भी शुक्रगुजार हूं जिन्होंने अपनी प्रार्थनाओं और दुआओं से मुझे मैदान में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की ताकत दी. मैं अपने घरेलू मैदान पर करियर का आखिरी टेस्ट मैच खेलूंगा.

सचिन ने एक नन्हे से खिलाड़ी के रूप में अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरूआत करके पूरी दुनिया को अपनी बल्लेबाजी से चमत्कृत कर दिया था. उनके मुरीदों में क्रिकेट के डॉन, सर डॉन ब्रैडमैन भी शामिल थे. जिन्हें अपनी बल्लेबाजी की झलक सचिन की बल्लेबाजी में नज़र आती थी. शायद ही दुनिया में कोई ऐसा खिलाड़ी हो जो तीन पीढ़ी के खिलाड़ियों के साथ खेला हो और जिसे तीन पीढ़ियों ने खेलते भी देखा हो. इतना ही नहीं, तीनों ही पीढ़ी के लोग उसके खेल के प्रशंसक हों. सचिन की धैर्य, संयम और तकनीकि से परिपूर्ण बल्लेबाजी शैली ने उन्हें दुनिया का बेहतरीन बल्लेबाज बनाया. उनका 24 साल लंबा करियर चोटों से प्रभावित रहा, लेकिन हर बार चोट से उबरकर सचिन ने न केवल धमाकेदार वापसी की बल्कि  हर बार ऐसा मुकाम हासिल किया जिसके आस पास भी भटक पाना किसी भी बल्लेबाज़ के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. सचिन अपने टेस्ट करियर में तिहरा शतक नहीं लगा सके जबकि उनके समकक्ष रखे जाने वाले अधिकाश बल्लेबाज़ तिहरा शतक लगाने में कमयाब रहे. वेस्टइंडीज के विस्फोटक बल्लेबाज़ सर विवियन रिचर्डस सचिन के आदर्श थे. सचिन उनकी तरह आक्रामक शैली में बल्लेबाज़ी करने के लिए जाने जाते हैं, सचिन ने अपनी बल्लेबाजी से एकदिवसीय क्रिकेट का चरित्र ही बदल डाला. क्रिकेट के मैदान में आई तेजी का श्रेय सचिन को दिया जाना चाहिए.

सचिन के पिता ने उनका नाम संगीतकार सचिन देव बर्मन के नाम पर रखा था. सचिन ने मैदान पर बल्लेबाजी की ऐसी तान छेड़ी कि विरोधी भी उनकी प्रशंसा करने से नहीं चूके. जिस किसी ने उनके साथ क्रिकेट खेला और ड्रेसिंग रूम शेयर किया, उनमें कोई भी ऐसा नहीं था जो उनके व्यक्तित्व से प्रभावित न हुआ हो. सचिन एक बेहतरीन खिलाड़ी होने के साथ ही एक बेहतरीन व्यक्तित्व वाले इंसान हैं. उनके जितना विनम्र स्वाभाव का खिलाड़ी होने अनोखी बात है. क्रिकेट के मैदान पर सचिन ने बल्लेबाजी से ऐसा मंत्रमुग्ध किया कि शेनवार्न के साथ साथ प्रशंसकों को भी सपनों में उनके छक्के लगाते नज़र आते थे.

सचिन ने एक बार फिर यह साबित किया कि उम्र तो महज एक आंकड़ा है. खेल के लिए जब्बे और जुनून की जरूरत होती है. और सचिन के अंदर दोनों ही कूट कूट कर भरा हुआ है. आज भी सचिन नेट प्रेक्टिस में पहुंचने वाले सबसे पहले और वापस जाने वाले सबसे अंतिम खिलाड़ी होते हैं. सचिन के समकक्ष और समकालीन ब्रायन लारा जैसे कई दिग्गज खिलाड़ी सचिन से बहुत पहले अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह चुके हैं. लेकिन सचिन अब तक मैदान में खूंटा गाड़े हुए हैं. सचिन पर किसी ने संन्यास लेने का दबाव नहीं डाला उन्होंने यह फैसला स्वयं बहुत सोच समझ कर लिया है. जिस मुंबई की धरती पर  उन्होंने पहली बार बल्ला थामा, जिस धरती पर उन्होंने विश्‍वकप पर कब्जा किया, उसी मुंबई की धरती पर वह आखिरी बार अपने बल्ले का जौहर दिखाते नज़र आएंगे.

सालों भारतीय टीम को वन मैन आर्मी के रूप में जाना गया. पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान मार्क टेलर के शब्दों में कहें तो हम भारत कहलाने वाली टीम से नहीं हारेबल्कि हम सचिन नाम के शख्स से हारे. सचिन  सालोंअकेले अपने कंधों पर एक अरब भारतीयों की आशाओं का बोझ लिए चलते रहे और भारतीय क्रिकेट को सुनहरे लम्हे देते रहे.

सचिन को पूरे करियर में बेइंतहां प्यार, पैसा और प्रसिद्धि मिली. यह सब कभी भी सचिन के सिर चढ़कर नहीं बोला. न ही सचिन का नाम कभी किसी विवाद में आया. 1999 में फिक्सिंग के दौर में वह काजल की कोठरी से बेदाग निकल आए और क्रिकेट में लोगों का विश्‍वास बनाए रखने में बेहद अहम भूमिका अदा की. सही मायने में वह क्रिकेट के ब्रैंड एंबेस्डर हैं. उम्र के चालीसवें पड़ाव पर पहुंचने के बावजूद वह  युवाओं के आदर्शष हैं. सचिन ने भारत का नेतृत्व करके देश के सम्मान में चार चांद जड़ दिए. आज सचिन भारत में खेलों के पर्याय हैं. सचिन ही वह सख्श हैं जिसके कारण हमारे देश में खेलोगे कूदोगे तो होगे खराब वाली सोच बदल सकी और लोग खेलों को करियर के रूप में स्वीकार कर सके. इसका सारा श्रेय सचिन को ही जाता है.

भारतीय क्रिकेट के पितामह सचिन तेंदुलकर को भारतीय क्रिकेट का भविष्य सुरक्षित नज़र आने लगा है, शायद इसीलिए उन्होंने संन्यास लेने का फैसला किया है.  किसी भी खेल में कुछ खिलाड़ी ऐसे होते हैं जो उस खेल का हिस्सा बन जाते हैं और कुछ खिलाडी ऐसे होते हैं जो स्वयं खेल का पर्याय बन जाते हैं. सचिन एक ऐसे खिलाड़ी है जिसने क्रिकेट का ऐसा इतिहास लिखा है जिसे क्रिकेट जगत हमेशा याद रखेगा. दुनिया भर में जब-जब इस इतिहास को पढ़ा जाएगा तब- तब सचिन को सराहा जाएगा. 15 नवंबर 1989 को जब सचिन ने पदार्पण किया था तो वह भारतीय क्रिकेट के लिए स्वीट नवंबर बन गया, लेकिन इस बार सचिन का बल्ला उसी नवंबर के महीने में थमने जा रहा है, सचिन के करोड़ों प्रशंसकों के लिए अब नवंबर अब स्वीट नवंबर नहीं रह जाएगा.

1 comment

  • chauthiduniya

    सचिन को भारत रत्न मिलना शायद सौरभ गांगुली जैसो को रास नहीं आ रहा तभी वो ओरो के नाम सुझा रहे हे, वो सिर्फ सचिन के खेल को ही आंक रहे हे पर उन्होंने ये नहीं देखा कि पाकिस्तान के अलावा कई मुल्क भारत से जिन कारणो से ईर्षा करते हैं तो उनमे ताज महल,लता के साथ सचिन का नाम आता हे. ये सचिन ही हे जिससे जितना प्यार हिंदुस्तानी करते हैं उतना ही पाकिस्तानी ऑस्ट्रेलिया वाले और कई मुल्को के लोग करते हे. सचिन सिर्फ एक खिलाडी ही नहीं भारत का ऐसा हीरा हे जिसने हजारो पाकिस्तानियों के मन से भारत के प्रति बैर भाव को कम ही नहीं ख़तम भी किया हे. सौरभ गांगुली किसी एक का नाम बताये जिसने ऐसा किया हो. खेल खेलना सब जानते हे पर प्यार का बुत बन कर खेलने वाला सचिन जैसा दूसरा नहीं. ये सही हे कि सचिन विश्व रत्न हे.

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