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हॉकी इंडिया को ब्रासा का फार्मूला रास आएगा?
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हॉकी इंडिया को ब्रासा का फार्मूला रास आएगा?

पिछले महीने हुई विश्व कप हॉकी प्रतियोगिता में भारतीय टीम को आठवें स्थान से ही संतोष करना पड़ा. हालांकि हॉकी के मैदान में भारत के इतिहास के नज़रिए से देखें तो यह प्रदर्शन प्रशंसकों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, लेकिन पिछले कुछ सालों से भारतीय हॉकी जिस तरह लगातार अवसान की ओर आगे बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह नई उम्मीदों का संचार ज़रूर करता है. अपने पहले मुक़ाबले में भारतीय टीम ने जिस तरह पाकिस्तान की मज़बूत टीम को पटकनी दी, उससे यह भरोसा पैदा हुआ कि हॉकी के खेल में भारत का झंडा एक बार फिर लहरा सकता है. लेकिन, अगले मुक़ाबलों में ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और कोरिया की टीमों के ख़िला़फ मिली पराजय के बाद यह नशा जल्द ही काफूर भी हो गया. अब टूर्नामेंट की समाप्ति के बाद टीम के स्पेनिश कोच जोस ब्रासा ने भारतीय हॉकी के पुनरुत्थान के लिए एक नया फार्मूला पेश किया है. ब्रासा ने अपने प्रस्ताव में टीम के कोच के अधिकारों में वृद्धि की मांग की है और हॉकी के घरेलू ढांचे में भी आमूलचूल बदलाव की वकालत की है.

देश में हॉकी प्रशासन की मौजूदा हालत को देखते हुए इसकी संभावना कम ही दिखती है. भारतीय हॉकी फेडरेशन के विघटन के बाद हॉकी इंडिया का गठन किया गया, जो एक तदर्थ निकाय भर है. इसके अलावा स्पोर्ट्‌स अथॉरिटी ऑफ इंडिया और खेल मंत्रालय हॉकी प्रशासन के लिए जिम्मेदार हैं. अक्सर दोनों संस्थाएं एक-दूसरे के साथ पॉवर गेम खेलने में व्यस्त रहती हैं, जिससे खेल की हालत तो नहीं सुधरती, उल्टे खिलाड़ियों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ती है.

ब्रासा ने प्रोजेक्ट इंडिया नाम का एक दस्तावेज हॉकी इंडिया को सौंपा है, जिसमें उक्त सारी बातें कही गई हैं. इसमें यह भी कहा गया है कि कोच के पास खिलाड़ियों के चयन का अंतिम अधिकार होना चाहिए. टीम के चुनाव में राजनीतिक दख़लंदाज़ी बंद हो और पैसे की कमी जैसी कोई समस्या न हो. टीम का सपोर्ट स्टाफ ऐसा हो, जिस पर कोच भरोसा कर सके. कोच के लिए ज़्यादा अधिकारों की वकालत के पीछे ब्रासा का तर्क है कि विदेशों में पहले से ही यही व्यवस्था है. वहां टीम के चुनाव से लेकर उसके प्रदर्शन तक की  सारी ज़िम्मेदारी कोच की ही होती है. खिलाड़ियों की हालत में सुधार के लिए ब्रासा ने ग्रेडिंग सिस्टम, बीमा योजनाओं और घरेलू स्तर पर एक लीग की शुरुआत का सुझाव दिया है. लेकिन सवाल यह है कि क्या भारतीय हॉकी के कर्ताधर्ता ब्रासा के इन सुझावों को मानने के लिए तैयार होंगे? कोच के अधिकारों में वृद्धि का मतलब है ख़ुद उनके अधिकारों में कटौती. क्या वे इसके लिए राजी होंगे?

देश में हॉकी प्रशासन की मौजूदा हालत को देखते हुए इसकी संभावना कम ही दिखती है. भारतीय हॉकी फेडरेशन के विघटन के बाद हॉकी इंडिया का गठन किया गया, जो एक तदर्थ निकाय भर है. इसके अलावा स्पोर्ट्‌स अथॉरिटी ऑफ इंडिया और खेल मंत्रालय हॉकी प्रशासन के लिए जिम्मेदार हैं. अक्सर दोनों संस्थाएं एक-दूसरे के साथ पॉवर गेम खेलने में व्यस्त रहती हैं, जिससे खेल की हालत तो नहीं सुधरती, उल्टे खिलाड़ियों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ती है. इन संस्थाओं के अधिकारी खेल के बजाय अपना व्यक्तिगत स्वार्थ साधने की कोशिश में लगे रहते हैं. ऐसे में ब्रासा की सलाह उन्हें रास आएगी, यह मुमकिन नहीं दिखता. हम यह तो नहीं कह सकते कि ब्रासा के सुझावों को आंख मूंदकर मान लेना चाहिए. यूरोपीय टीमों में कोच सर्वशक्तिमान होता है, लेकिन भारत में ऐसा शायद ही मुमकिन हो. लेकिन यह जरूर हैकि ब्रासा के सुझावों पर विचार किया जा सकता है. आमूलचूल परिवर्तन न सही, लेकिन बदलाव की शुरुआत की छोटी सी उम्मीद तो जरूर कर सकते हैं.

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