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भारत में अंतरराष्ट्रीय एथलीट पैदा करने की इच्छाशक्ति नहीं : भूखे पेट कैसे लाएं मेडल!
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भारत में अंतरराष्ट्रीय एथलीट पैदा करने की इच्छाशक्ति नहीं : भूखे पेट कैसे लाएं मेडल!

gameदेश के जाने-माने कोच जेएस भाटिया बोले, ‘खेलों को अब खिलाड़ियों ने सरकारी नौकरी पाने का जरिया बना लिया है. खिलाड़ियों में जीतने की भूख नहीं दिखती. केवल ओलम्पिक खेल लेने से बड़े खिलाड़ी नहीं बनते हैं. देश में एथलेटिक्स के विकास की कोई योजना ही नहीं है. पैसे खर्च करके मेडल थोड़े ही मिलते हैं. अपने जमाने के मशहूर धावक गुलाब चंद ने कहा, भारत में खेलों की कोई ठोस योजना नहीं है. प्रतिभा निचले स्तर से खोजनी होगी. विदेशों के मुकाबले भारत में ट्रेनिंग जीरो है. सुविधा और पैसों के अभाव में भारतीय प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं.

रियो ओलम्पिक  में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय खिलाड़ी लगातार अपनी साख गिरा रहे हैं. यह बात भी सत्य है कि क्रिकेट में अगर भारत का डंका पूरे विश्‍व में बोलता है तो दूसरे खेलों में भारतीय खिलाड़ी एड़ियां रगड़ते हैं. उनका प्रदर्शन विश्‍व स्तर का नहीं होता है. भारत को कोई ऐसा एथलीट नहीं मिल पाया है जो विश्‍व खेल जगत में पहचान बनाए. अतीत में एकाध एथलीट अपने प्रदर्शन के दम पर भारत का गौरव बढ़ा पाए लेकिन वर्तमान दशा इसके एकदम उलट है. ओलम्पिक  जैसी प्रतियोगिता में भारतीय एथलिटों के न चलने से खेल प्रेमियों को भी अब अखरने लगा है. ओलम्पिक  जैसी बड़ी प्रतियोगिता में भारी-भरकम दल भेजा जाता है लेकिन बाद में एथलीटों का प्रदर्शन इतना घटिया होता है कि हम और शर्मसार होने पर मजबूर हो जाते हैं. यह ठीक है कि हार और जीत खेल का हिस्सा होता है, लेकिन यह भी सत्य है कि जीत खुशी और गौरव देती है और हार निराशा और शर्म. एथलेटिक्स में भारतीय खिलाड़ी लगातार पिछड़ रहे हैं. पदक तो दूर की बात है उनका क्वालीफाई करना भी मुश्किल हो जाता है. इतिहास के पन्नों को पलटें तो मिल्खा सिंह की तूती किसी जमाने में खूब बोलती थी. रोम ओलम्पिक में मामूली अंतर से कांस्य पदक से चूकने वाले मिल्खा को उनके शानदार खेल के लिए फ्लाइंग सिख के नाम से जाना जाता था. 50 और 60 के दशक में मिल्खा की रफ्तार देखते ही बनती थी. मिल्खा के बाद 80 के दशक में शाइनी रफ्तार की नई उड़ान भर रही थीं. हालांकि पीटी उषा ने उनसे ज्यादा नाम कमाया. 80 और 90 के दशक में दोनों एथलीटों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का खूब मान बढ़ाया था, लेकिन मिल्खा के बाद पीटी उषा भी ओलम्पिक  में पदक जीतने से चूक गई थीं. यह बात गुजरे जमाने की है. अभी भारतीय एथलीटों का प्रदर्शन वर्ल्ड क्लास का नहीं है. सरकार पैसे खर्च करती है, लेकिन ठोस योजनाओं के अभाव में खिलाड़ियों का प्रदर्शन प्रभावित होता है. जाने-माने एथलेटिक्स कोच जेएस भाटिया ने भी भारतीय एथलेटिक्स के स्तर की कड़ी आलोचना की है. उन्होंने ‘चौथी दुनिया’ से एक विशेष बातचीत में कहा कि भारतीय खिलाड़ियों में प्रतिबद्धता की कमी है. ओलम्पिक  में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन के बारे में उनकी साफ राय यही थी कि भारतीय खिलाड़ी विजय के लिए नहीं खेलते हैं बल्कि एकाध प्रदर्शन की बदौलत सरकारी नौकरी के लिए लालायित रहते हैं. उन्होंने कहा कि छोटे देश भी जबरदस्त एथलीट पैदा करते हैं, लेकिन भारत में एथलीटों का अकाल पड़ा हुआ है. उनके मुताबिक खिलाड़ियों ने खेलों को अब सरकारी नौकरियों का जरिया बना लिया है. अक्सर खिलाड़ी छोटी-मोटी प्रतियोगिता में पदक जीतकर सरकारी नौकरी का दावा ठोक देते हैं. नौकरी मिलने के बाद वे आराम से दिन गुजारने लगते हैं और देश के लिए बड़े स्तर पर पदक जीतने की उनकी भूख मर जाती है. जेएस भाटिया का दर्द साफ-साफ देखा जा सकता है. वे कहते हैं कि ओलम्पिक  जैसी बड़ी प्रतियोगिता में देश का कोई खिलाड़ी पदक नहीं जीत पाए, यह दुर्भाग्यपूर्ण ही होता है. दूसरे देशों में एथलेटिक्स के लिए एक अलग जूनुन देखा जाता है. बकायदा खिलाड़ियों को बड़े स्तर के लिए तैयार किया जाता है लेकिन भारत में ऐसा नहीं है. यहां खिलाड़ियों में यह भाव रहता है कि ओलम्पियन बनना ही बड़ी उपलब्धि है. दरअसल भारतीय खिलाड़ी ओलम्पिक में हिस्सा लेने के लिए उतावले तो होते हैं लेकिन पदक जीतने की बात आती है तो वे टांय-टांय फिस्स हो जाते हैं. अक्सर खिलाड़ी ओलम्पियन बनकर अपने करियर से संतुष्ट हो लेता है. जेएस भाटिया ने बेबाकी से कहा कि सरकार पैसा खर्च कर मेडल चाहती है लेकिन यह सम्भव नहीं है. सरकार खिलाड़ियों पर करोड़ों खर्च तो करती है, लेकिन उसे सही दिशा में खर्च नहीं किया जाता है और खेलों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार के पास कोई ठोस योजना भी नहीं है. छोटे-छोटे देश ओलम्पिक  में स्वर्ण पदक हासिल कर लेते हैं, लेकिन भारतीय खिलाड़ी वंचित रह जाते हैं. साफ है कि उनमें पदक जीतने की भूख नहीं होती. जिन खिलाड़ियों में यह भूख होती है, वे सिंधु या मलिक की तरह जद्दोजहद करके पदक जीत ही लेते हैं.

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अपने जमाने के दिग्गज एथलीट रहे गुलाबचंद भी मानते हैं कि भारत में एथलेटिक्स को कोई खास सुविधा नहीं है. खिलाड़ियों को कभी खेल से जोड़ने की कोशिश नहीं की जाती है. विदेशी खिलाड़ी कई मामलों में भारतीय खिलाड़ियों से काफी आगे होते हैं. भारत में मैदान है, लेकिन सुविधा का अभाव है. गुलाबचंद कहते हैं कि अगर एथलेटिक्स में भारत को करिश्मा करना है तो नई प्रतिभाओं को ग्रास रूट से खोजना होगा. भारत में कोचिंग का स्तर भी एकदम शून्य पर है, जबकि विदेशों में बच्चों को शौक के हिसाब से खेलों में तराशा जाता है. भारत में तो स्टेडियम में एथलेटिक्स से सम्बन्धित सामान मौजूद ही नहीं रहता. अक्सर भारतीय खिलाड़ियों को विदेशों में ट्रेनिंग करनी पड़ती है. सुविधा और पैसों के अभाव में भारतीय प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं. जूनियर स्तर पर अगर खिलाड़ियों को तैयार किया जाए तो बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं.

आखिर क्या कारण है एथलेटिक्स में भारत के पिछड़ने का

भारत में क्रिकेट जैसे खेल लगातार अपनी पैठ जमा रहे हैं जबकि अन्य खेल लगातार दम तोड़ रहे हैं. एथलेटिक्स में भारत के पास कोई बड़ा नाम नहीं है. रियो ओलम्पिक में भारत की एथलेटिक्स टीम कुछ खास नहीं कर सकी. दरअसल भारत में खेलकूद को लेकर सरकार मुस्तैद भी नहीं रहती. खिलाड़ियों को आधारभूत सुविधाएं ही नहीं मिल पातीं. खेलों के विकास पर अन्य देशों में जितना ध्यान दिया जाता है, उतना भारत में नहीं दिया जाता. बल्कि खेलों में भी राजनीति अंदर तक घुस कर दीमक की तरह उसका सत्यानाश कर रही है. खास तौर पर एथलेटिक्स को स्कूली स्तर पर बढ़ावा नहीं दिया जाता है. केवल नाम के लिए स्कूलों में खेलों को शामिल किया जाता है लेकिन प्रतिभा तलाशने का कोई सार्थक काम नहीं होता. राष्ट्रीय स्तर पर जो संघ हैं वह एथलेटिक्स को आगे बढ़ाने के बजाय राजनीति करने और अपनी जेबें भरने में लगे रहते हैं. सरकार पैसा खर्च करती है लेकिन संघ की लापरवाही का खामियाजा खिलाड़ियों को भुगतना पड़ता है. खेलों के विशेषज्ञ बार-बार यह मांग करते रहते हैं कि भारतीय ओलम्पिक संघ और सरकार को साथ मिलकर प्रतिभाओं को खोजना चाहिए. छोटे-छोटे राज्यों से भी खिलाड़ी आते हैं लेकिन बड़े स्तर पर नहीं पहुंच पाते हैं, क्योंकि उन्हें तराशने के लिए समयबद्ध योजना का अभाव है. खिलाड़ी आर्थिक स्थिति में कमजोर होने के कारण वे आगे नहीं बढ़ पाते और सरकारें या संस्थाएं उनकी कोई मदद नहीं कर पातीं. भारत में कोचों की भी भारी कमी है. प्रतिभावान एथलीटों को औसत दर्जे की ट्रेनिंग से काम चलाना पड़ता है. स्कूली स्तर पर प्रतिभा को खोजने के लिए भारतीय ओलम्पिक संघ कभी जहमत तक नहीं उठाता है. संघों को मिलने वाली राशि का सही प्रयोग भी नहीं होता है. भारत जैसे देश में क्रिकेट को लोग धर्म की तरह देखते हैं लेकिन एथलेटिक्स को लेकर ऐसा नहीं है. क्रिकेट में अगर कोई स्टार होता है तो उसपर पैसों की बारिश होती है. वहीं एथलेटिक्स के कई खिलाड़ी छोटी-मोटी नौकरी कर किसी तरह से गुजारा करते हैं. खिलाड़ियों के डाइट प्लान को लेकर योजना नहीं होती है. अक्सर खिलाड़ियों को सही खाना नहीं मिल पाता है. इससे मैदान में वह प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं कर पाते. खराब खाने की वजह से उनमें स्टेमिना और दृढ़ इच्छाशक्ति की भारी कमी देखी जाती है. खेल विशेषज्ञ यह मानते हैं कि भारत में स्पोर्ट्स कल्चर नहीं है. दूसरे देशों में खेलों को संस्कृति की तरह लिया जाता है. यहां खिलाड़ियों को खुद की अपनी प्रतिभा को निखारने के लिए जीतोड़ मेहनत करनी पड़ती है. भारतीय खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के तरीकों में खामी पायी जा सकती है. तकनीक रूप से भी पिछड़ने के चलते खिलाड़ियों का प्रदर्शन प्रभावित होता है. विदेशों में एथलीटों को ट्रेनिंग देने के लिए आधुनिक तकनीक के साथ-साथ नये उपकरणों का साथ मिलता है. कुल मिलाकर देखा जाये तो भारत में खेलों को लेकर कोई सिस्टम नहीं है. अगर भविष्य में एथलेटिक्स में पदक की भूख जगानी है तो बुनियादी स्तर पर काम करना होगा तभी हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने का दावा कर सकते हैं.

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मशहूर एथलीट ने खिलाड़ियों को मिलने वाली डाइट पर उठाया सवाल

देश के जाने-माने एथलीट व आयरन-मैन के नाम से मशहूर विजय सिंह चौहान ने भी ओलम्पिक में भारत के प्रदर्शन पर गहरा अफसोस जताया. उन्होंने कहा कि भारतीय एथलीटों में प्रतियोगी मानसिकता की भारी कमी है. विजय सिंह ने भारतीय खिलाड़ियों को दी जाने वाली डाइट पर भी सवाल उठाय. उन्होंने कहा कि भारतीय खिलाड़ियों को छह हजार कैलोरी मिलती है, लेकिन विदेशी खिलाड़ियों को दस हजार कैलोरी दी जाती है. यही फर्क है उनके और हमारे खिलाड़ियों के प्रदर्शन में. भारत में पानी से लेकर हवा तक दूषित हो चुकी है. इसके चलते भी खिलाड़ियों के प्रदर्शन में गिरावट आई है. विजय सिंह बेबाकी से कहते हैं कि अन्य देशों में एथलीटों को तैयार करने का अलग मापदंड होता है जबकि भारत में ऐसा कोई मापदंड निर्धारित नहीं है. उन्होंने क्यूबा का उदाहरण देते हुए बताया कि 1962 में क्यूबा में 60 प्रतिशत धन मेडिकल पर खर्च किया जाता था लेकिन जब उन्होंने अपने यहां खेलों को अनिवार्य बनाया तो 1982 में 20 प्रतिशत मेडिकल और शेष स्पोर्ट्स पर खर्च होना शुरू हुआ. इसके साथ ही वहां ओलम्पिक में मेडल भी आना शुरू हो गया. बॉक्सिंग में उनके खिलाड़ी स्वर्ण पर पंच लगाते दिख रहे हैं. भारत में स्पोर्ट्स अनिवार्य नहीं है जबकि यूनीसेफ की दलील है कि स्पोर्ट्स को शुरू से ही अनिवार्य कर देना चाहिए. इससे नागरिक स्वस्थ्य भी रहेंगे और एथलीटों की तैयारी में भी आसानी होगी. विजय सिंह ने बताया कि ऑॅस्ट्रेलिया में 25 लाख लोगों को खेलों में प्रशिक्षण दिया जाता है. पांच साल तक कठिन ट्रेनिंग कराई जाती है. इसके बाद उनमें से पांच लाख लोगों को रुचि के हिसाब से छांट लिया जाता है. इसी पांच लाख लोगों को अगले पांच साल ट्रेनिंग दी जाती है और इसके बाद कुछ नामों को चुनकर उन्हें ओलम्पिक लिए तैयार किया जाता है. उन्होंने कहा कि भारत में कोचिंग का स्तर भी बेहद खराब है. कोच को ट्रेनिंग के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है. देश में स्पोर्ट्स इंजरी के विशेषज्ञ नहीं हैं, जिसकी वजह से भारतीय एथलीटों को बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है. कोच को खिलाड़ियों की चोटों के बारे में भी कुछ भी पता नहीं होता. जबकि विदेशों में हर खिलाड़ी के साथ इंजरी विशेषज्ञ अटैच होता है. हर विभाग के लिए एक कोच की तैनाती रहती है. भारत में खिलाड़ी कमजोर होते हैं. मशीनें खराब पड़ी हैं, उसे ठीक करने वाला भी कोई नहीं है.

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लेकिन अब दूसरा मिल्खा नहीं मिल रहा है

इतिहास में भारतीय खिलाड़ियों ने एथलेटिक्स में शानदार प्रदर्शन किया है. मिल्खा सिंह का नाम पूरी दुनिया में जाना जाता है. फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा ने विदेशों में भारत का खूब नाम रौशन किया है. मिल्खा के प्रदर्शन पर नजर दौड़ाएं तो उन्होंने एशियन गेम्स में चार और कॉमनवेल्थ गेम्स में एक स्वर्ण पदक जीता था. साथ ही उन्होंने एक-एक सिल्वर और ब्रॉन्ज भी अपने नाम किया था. मिल्खा सिंह के दौर में सुविधाओं का टोटा था. उस जमाने में स्पोर्ट्स को लेकर कोई खास चर्चा भी नहीं होती थी. आज के जमाने में संदीप कुमार, रंजीत  माहेश्‍वरी और विकास गौड़ा जैसे एथलीट भले ही जीत का दावा भरें लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में वे धड़ाम हो जाते हैं. भारतीय खेल जगत को इस पर भी गौर करना होगा कि इन खिलाड़ियों पर लम्बा खर्चा किया जाता है, ओलम्पिक जैसी प्रतियोगिता के लिए विदेशी कोचों से लेकर तमाम सुविधाएं भी दी जाती हैं. फिर कहां चूक हो जाती है. हमें अब पीटी उषा या शाइनी अब्राहम जैसी एथलीट क्यों नहीं मिल रही हैं? दूसरी ओर तमाम सुविधाओं से परे कुछ खिलाड़ी इतिहास बनाने की हिम्मत रखते हैं. इतिहास में अंजू बॉबी जॉर्ज भी ऐसा नाम था जिसने भारत का मान बढ़ाया. ओलम्पिक ही नहीं भारतीय एथलेटिक्स खिलाड़ियों का प्रदर्शन अन्य प्रतियोगिता में भी बेहद खराब रहता है. हालांकि 2003 में अंजू बॉबी जॉर्ज ऊंची कूद में कांस्य पदक जीतने में सफल रहीं. ओलम्पिक में भारत के कई खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं. मास्को ओलम्पिक में 15 और बीजिंग में 17 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था लेकिन सबका प्रदर्शन बेहद खराब रहा. यह भी एक कटु सत्य है कि यही एथलीट क्वालीफाई करने में राष्ट्रीय रिकॉर्ड तक बनाते हैं लेकिन ओलम्पिक में रिकॉर्ड तो दूर की बात है, फाइनल तक पहुंचने के लाले पड़ जाते हैं. केवल खिलाड़ियों पर दोष मढ़ना ठीक नहीं, क्योंकि इसमें खेल संघों का ‘खेल’ अधिक जिम्मेदार है. भारतीय ओलम्पिक संघ को सोचना होगा कि भारतीय खिलाड़ियों को ओलम्पिक जैसी प्रतियोगिता के लिए कैसे तैयार किया जाए.

1 comment

  • admin

    Sir mai v suru se sports mai jana chahta tha par kisi ne hamare talent ko nhi samjha par man mai abhi v desire baki h

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