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आईपीएल बना टेस्ट क्रिकेट का काल
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आईपीएल बना टेस्ट क्रिकेट का काल

टेस्ट मैचों में भारत की भद पिटने का सबसे बड़ा और प्रमुख कारण आईपीएल है. युवा खिलाड़ी टेस्ट टीम के बजाए आईपीएल टीम में जगह बनने की कोशिश करते हैं, यहीं से खिलाड़ी की गुणवत्ता में फर्क आने लगता है. आईपीएल में आए अपार धन ने भारत को गहरी और ऐसी जगह चोट पहुंचाई है जिसे न तो वो दिखा सकता है न छिपा सकता है..

2014_8$img17_Aug_2014_AP8_1भारतीय टीम की लगातार दूसरी बार इंग्लैंड दौरे पर शर्मनाक हार हुई है. इस बार भारतीय टीम को 3-1 से हार मिली है जबकि पिछले दौरे के दौरान भारत का सूपड़ा साफ हो गया था. भारतीय टीम चार मैंचों की सीरीज में 4-0 से हार हो गई थी. महेंद्र सिंह धोनी अपना कोई विकल्प न उपलब्ध होने की वजह से फिलहाल बच गए हैं, लेकिन कोच डंकन फ्लेचर के सिर पर तलवार लटक गई है. फिलहाल बीसीसीआई ने पूर्व कप्तान रवि शास्त्री को टीम का डायरेक्टर नियुक्त कर दिया गया है.

बीसीसीआई के इन निर्णयों का सीधा मतलब यह है कि जल्दी ही डंकन फ्लेचर की भारतीय क्रिकेट टीम के कोच के पद से छुट्टी हो जाएगी. उनके पास टीम के कोच के रूप में गिने-चुने दिन ही बचे हैं. बीसीसीआई ने तत्काल फ्लेचर की छुट्टी का फरमान इसलिए जारी नहीं किया, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया में होने वाले विश्‍वकप में कुछ ही महीने का समय बाकी है. ऐसे में एक ही झटके में कोच को पद से हटा देने से भारतीय टीम की तैयारियों पर बुरा असर पड़ेगा और विश्‍व चैंपियन का खिताब बचाना टीम इंडिया के लिए बेहद मुश्किल हो जाएगा. ऐसे में उसने ऐसे भारतीय खिलाड़ियों की टीम में प्रशिक्षकों के रुप में नियुक्ति कर दी है, जिन्हें भारतीय क्रिकेट में सचमुच दिलचस्पी है. इन लोगों को किसी व्यावसायिक हित में दिलचस्पी नहीं है. फ्लेचर की छुट्टी होने से पहले ये लोग टीम की दूरदर्शी नीतियों और खिलाड़ियों की जरुरतों को समझ पाएंगे. इस लिहाज से बीसीसीआई ने सही निर्णय लिया है.
विश्‍वकप खिताब बचाने के लिए भारतीय टीम को गुरु ग्रैग की तरह टीम को एक जुट करने और टीम को प्रोत्साहित करने वाले कोच की अदद जरूरत है. टीम जिस बुरे दौर से गुजर रही है उसमें बदलाव अचानक नहीं होगा, इसके लिए प्रशंसकों को थोड़ा धैर्य बरतना होगा. फ्लेचर का इंग्लैंड दौरे के बाद वेस्टइंडीज के खिलाफ होने वाली घरेलू सीरीज तक उनका टीम के साथ बने रहना मुश्किल हो सकता है. रवि शास्त्री के डायरेक्टर बनने बाद उनके पास को कोई अधिकार नहीं बचे हैं. टीम से जुड़े फैसले रवि करेंगे और फ्लेचर को भी यह बात अच्छी तरह पता है. इस समय सहायक स्टाफ में उनकी कोई पसंद नहीं है और डंकन को पीछे हटना पड़ेगा. यदि फ्लेचर इस्तीफा देते हैं, तो बीसीसीआई उन्हें रोकेगा नहीं. ऐसे भी फ्लेचर को पद छोड़ने के संकेत दिए जा चुके हैं. अब रवि शास्त्री और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी मिलकर टीम की रणनीति बनाएंगे. शास्त्री के अलावा जिन लोगों की टीम में बतौर कोचिंक स्टाफ नियुक्ति की गई है, वो खुद को साबित कर चुके हैं. पिछले आईपीएल सीजन में संजय बांगड़ किंग्स इलेवन पंजाब के कोच के रुप में खुद को उपयोगी साबित कर चुके हैं. उनकी सूझबूझ और प्रशिक्षण की बदौलत ही किंग्स इलेवन पंजाब आईपीएल के फाइनल तक पहुंची थी. बांगर टीम के युवा सदस्यों को भी जानते हैं. बतौर गेंदबाजी कोच अरुण की नियुक्ति भी जायज है, क्योंकि टीम में अभी जो भी तेज़ गेंदबाज हैं उन्होंने एनसीए में अरुण के मार्गदर्शन में ही गंदबाजी के गुर सीखे हैं. इसके साथ ही आर श्रीधर को फील्डिंग कोच की भूमिका दी गई है ऐसे में डंकन के विदा होने के बाद अलग-अलग लोग मिलकर टीम की जिम्मेदारी संभालेंगे. वेस्टइंडीज के खिलाफ घरेलू सीरीज के दौरान नए स्टाफ को टीम के साथ घुलने-मिलने और समझने का मौका मिलेगा. फ्लेचर के साथ बीसीसीआई का अनुबंध 2015 विश्‍वकप के बाद तक है, लेकिन अनुबंध में उन्हें उससे पहले भी हटाए जाने का प्रावधान है. हालांकि राहुल द्रविड़ को टीम का कोच बनाए जाने पर भी बीसीसीआई ने विचार किया था, लेकिन राहुल इसे लेकर अधिक उत्साहित नहीं थे, क्योंकि बतौर कोच परिवार को छोड़कर काफी यात्रा करनी पड़ती है.
बीसीसीआई के इस निर्णय से भारतीय क्रिकेट की बदहाली को लेकर उठे सवाल शांत नहीं हुए हैं. खेल के जानकर जहां इस नियुक्ति से हैरान हैं, वहीं उन्हें लगता है कि रातों-रात कुछ नहीं बदलने वाला है. खेल पंडितों का कहना है कि रवि शास्त्री डायरेक्टर बनकर कौन सा तीर मार लेंगे. वह रातों-रात टीम को प्रदर्शन सुधारने के लिए ऐसा कौन सा मंत्र दे देंगे. टेस्ट मैचों में हार के बाद टीम इंडिया वनडे सीरीज में अच्छा प्रदर्शन करेगी, तो वह अपने बल बूते पर खेलेगी. इसलिए शास्त्री की नियुक्ति को हार के कारणों को छुपाने के लिए की गई है. रवि शास्त्री एन श्रीनिवासन के बेहद करीबी हैं, इसलिए हार के कारणों पर लीपा-पोती करने की जिम्मेदारी उन्हें दी गई है. हकीकत में यह भद्दा मजाक है. इस वक्त बात तो टेस्ट क्रिकेट में भारत की बदहाली की होनी चाहिए. क्या बोर्ड की जिम्मेदारी नहीं है कि वह पिछले तीन-चार साल में टीम की हालत की जिम्मेदारी खुद ले. इसके लिए वह कोच को कसूरवार न ठहराएं. मैदान पर खिलाड़ी खराब या अच्छा खेलते हैं, उसके लिए बीसीसीआई की नीतियां खिलाड़ियों के खराब प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार हैं. पैसा पैसा और पैसा बीसीसीआई केवल यही मंत्र जप रहा है.
भारतीय क्रिकेट टीम जिस तरह इंग्लैंड के खिलाफ शुरूआती बढ़त लेने के बावजूद हारी है, ऐसे में बोर्ड की काफी किरकिरी हो रही है. इस बात को दबाने के लिए उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की है कि देखिए हमने रवि शास्त्री को डायरेक्टर बना दिया है, लेकिन रवि शास्त्री के आने से टेस्ट सीरीज के शर्मनाक परिणाम तो नहीं बदल जाएंगे. क्रिकेट में डायरेक्टर का क्या रोल है यह समझ से परे है. क्रिकेट में हेड कोच, सहायक कोच, फील्डिंग, बैटिंग, गेंदबाजी कोच सहायक कोच होते हैं, लेकिन डायरेक्टर नहीं. रवि शास्त्री के पास कितनी ताक़त होगी, वह कैसे काम करेंगे, क्या उनके पास कप्तान और कोच के फैसलों के खिलाफ वीटो पावर होगी?अभी ऐसा कुछ भी कह पाना मुश्किल है. किसी भी चीज के बनने और बिगड़ने में वक्तलगता है. चाहे वह रवि शास्त्री हों, संजय बांगड़ हों, भारत अरुण हों या फिर श्रीधर. उन्हें समय देना पडेगा. एक सिरीज़ से किसी भी बदलाव की उम्मीद अभी करना बेमानी है. भारतीय क्रिकेट में जो विकृति पिछले 4-5 सालों में आई है, उसे बदलने में वक्त लगेगा. सब कुछ एक झटके में ठीक हो जाएगा यह सोच गलत है.
लोगों को इस बात की शंका होने लगी है कि भारतीय खिलाड़ी टेस्ट मैच खेलना चाहते भी या नहीं. टेस्ट क्रिकेट एक खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होते हैं. टेस्ट मैच खेलने के लिए कड़ी मेहनत, कौशल और लगन की आवश्यकता होती है. टेस्ट मैच खिलाड़ी की शारीरिक, मानसिक और तकनीकि क्षमता का टेस्ट होते हैं. भारतीय खिलाड़ी इन तीनों फ्रंट पर लगातार फेल हो रहे हैं. इसके साथ ही भारतीय टीम ने इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज के दौरान दोयम दर्जे की फील्डिंग की है. कैचेज विन मैचेज, यह कहावत भारतीय टीम के परिपेक्ष्य में बिलकुल सही साबित हुई है. किसी भी टीम पर आप कैच छोड़कर दबाव नहीं बना सकते हैं. जीतने के लिए आपको कैच लपकने होंगे. एक गेंदबाज मेहनत करके आपके लिए मौके बनाता है आप कैच छोड़ दें तो यह बहुत
निराशाजनक होता है. इसके बाद गेंदबाज गेंदबाजी की प्लानिंग को छोड़कर काम करने लगता है, यह प्रयास गेंदबाज की लाइन लेंथ को प्रभावित करता है. भारतीय खिलाड़ियों को एक बार फिर से बेसिक्स पर ध्यान देना होगा. पहले भारतीय टीम जब विदेश दौरे पर जाती थी तो उसे वहां के वातावरण और पिचों के अनुकूल ढ़लने में थोडा वक्त लगता था. शुरूआती मैचों में भारतीय खिलाड़ी संघर्ष करते दिखाई देते थे, लेकिन जैसे-जैसे सीरीज आगे बढती थी भारतीय खिलाड़ी परिस्थितियों के अनुकूल ढ़ल जाते थे, लेकिन इस बार आगाज अच्छा हुआ, लेकिन अंजाम बहुत बुरा. ऐसा किसी ने सोचा नहीं था. पहले दो टेस्ट में बढ़त बना लेने के बाद लगातार तीन टेस्ट मैच बिना संघर्ष किए हार जाना बहुत निराशाजनक है. खिलाड़ियों को शर्म आनी चाहिए कि देश का प्रतिनिधित्व करने गए खिलाड़ी देश के लिए संघर्ष भी नहीं कर सके, अधिकांश समय वो घुटने के बल चलते दिखाई दिए.
टेस्ट मैचों में भारत की भद पिटने का सबसे बड़ा और प्रमुख कारण आईपीएल है. युवा खिलाड़ी टेस्ट टीम के बजाए आईपीएल टीम में जगह बनने की कोशिश करते हैं, यहीं से खिलाड़ी की गुणवत्ता में फर्क आने लगता है. आईपीएल में आए अपार धन ने भारत को गहरी और ऐसी जगह चोट पहुंचाई है जिसे न तो वो दिखा सकता है न छिपा सकता है. दिखा इसलिए नहीं सकता है, क्योंकि यदि वह ऐसा करता है, तो आईपीएल से होने वाली आमदनी बंद हो जाएगी. छिपा इसलिए नहीं सकता, क्योंकि आईपीएल भारतीय खिलाड़ियों की कमजोरियां टेस्ट मैचों में दिखाई देने लगती हैं. भारतीय खिलाड़ी सीमित ओवर का क्रिकेट खेलने के लिए फिट हैं, लेकिन पांच दिन तक टेस्ट मैच खेलना उनके बस में नज़र नहीं आ रहा है. खिलाड़ियों मे न तो पिच में टिकने का संयम है न ही खेल की बेहतर तकनीक. टी-20 क्रिकेट का किसी भी तरह रन बना लेने वाला अंदाज बल्लेबाजों के लिए घातक हो गया है. गेंदबाज विकेट लेने से ज्यादा रन बचाने में लगे रहते हैं. स्पिनर्स गेंद को फ्लाइट कराने से बचते दिखते हैं. टेस्ट क्रिकेट में जीत दर्ज करने के लिए विपक्षी टीम को दो बार आउट करना होता है. ये क्रिकेट के बेसिक्स हैं. अर्जुन रणतुंगा जैसे खिलाड़ियों ने आईपीएल की शुरूआत के दौरान ही इसका विरोध किया था. तब उनके जैसे कई खिलाड़ियों ने आशंका जताई थी की टेस्ट क्रिकेट को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. आज ये नौबत आ गई है कि देश में अच्छे टेस्ट खिलाड़ियों का अकाल पड़ गया है. आईपीएल में खेलने वाले बहुत से खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट की वैल्यू की बात करने लगे हैं. इसका सीधा अर्थ है कि खिलाड़ी एक बार फिर जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं. लेकिन पैसे और बाजार के दबाव में खिलाड़ियों के अरमान कुचले जा रहे हैं. आईपीएल भारतीय टेस्ट क्रिकेट का काल बन गया है.

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