fbpx
Now Reading:
पराजय दर पराजय, कुछ तो गडबड है
Full Article 5 minutes read

पराजय दर पराजय, कुछ तो गडबड है

ऑस्ट्रेलिया से वन-डे सीरीज़ में हार पर भड़किए मत चिंता कीजिए.  चिंता इस बात की नहीं कि टीम इंडिया नंबर वन के पायदान से दूर हो गई, बल्कि चिंता इस बात की कि आख़िर कुछ तो गड़बड़ है, जो सा़फ देखी जा सकती है. यह स़िर्फ संयोग नहीं कि टी-20 वर्ल्ड कप, चैंपियंस ट्रॉफी और अब ऑस्ट्रेलिया सीरीज़ में भारत को हार मिली है. लगातार तीन बड़ी सीरीज़ और लगातार तीन बार एक ही नतीजा. आख़िर क्या है ऐसा, जो टीम इंडिया के लिए सबसे बड़ी मुसीबत है. यह बल्लेबाज़ी नहीं है. यह गेंदबाज़ी भी नहीं है और न ही यह आरामतलब फील्डिंग है. बल्कि, ध्यान से देखने पर पता चलेगा कि सीज़न की शुरुआत से ही विरोधियों को घेर लेने वाली कप्तानी ग़ायब है.

2007 वर्ल्ड कप में हार के   बाद भारतीय क्रिकेट कुछ महीनों के  लिए जैसे अंधकार युग में चला गया था. क्रिकेट खेलने, लिखने और यहां तक कि देखने वालों की उम्मीदें कम नहीं, बल्कि ख़त्म हो गईं थीं. सचिन ने कप्तानी से इंकार कर दिया था. उनके   साथ सौरव औऱ द्रविड़ ने तो साउथ अफ्रीका जाने तक से इंकार कर दिया था. उसके  बाद जो हुआ, इतिहास है. लेकिन इस पूरे टूर्नामेंट के  बाद कप्तानी का एक युग धोनी के  हाथों से शुरू हुआ था.

चाहे टी-20 वर्ल्ड कप के  फाइनल में यूसुफ पठान को पहला मैच खिलाने का फैसला हो या बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के  आख़िरी मैच में गांगुली को कप्तानी देने का. अब न तो वह धोनी नज़र आ रहा है, जिसने ऑस्ट्रेलिया को उसी के  घर में वन-डे सीरीज़ में मात दी थी, जिसने प्रवीण कुमार जैसे खिलाड़ी को सीबी सीरीज़ के  अहम मैच में बड़ी भूमिका दी. लेकिन पिछली तीन सीरीज़ में धोनी कहीं खोए लगे.

पिछली तीनों अंतरराष्ट्रीय सीरीज़ पर नज़र डालिए. आप पाएंगे कि एक ही ग़लती बार-बार हुई है. मौक़े को भांप न पाने की ग़लती. चैंपियंस ट्रॉफी में भारत के  गेंदबाज़ पिटे, लेकिन धोनी ने गेंदबाज़ों से बात तक नहीं की. यह  कप्तान के   साथ एक कीपर का भी फर्ज़ होता है. फील्ड प्लेसिंग में भी पिछले साल ऑस्ट्रेलिया सीरीज़ जैसी कोई नई सोच नहीं थी. ऐसा लग रहा था कि जैसे खिलाड़ियों को काम दे कर वह अपना पल्ला झाड़ चुके  थे. अगर ऐसा था तो टीम इंडिया मैदान में उतरने से पहले ही मैच हार चुकी थी. लेकिन अगर ग़ौर से देखें तो पाएंगे कि स़िर्फ अंतरराष्ट्रीय मैच ही नहीं, बल्कि साउथ अफ्रीका में हुए आईपीएल से ही धोनी खोए-खोए लग रहे थे.

उस व़क्त ऐसा लग रहा था कि पद्म पुरस्कारों पर हुए विवाद की वजह से धोनी मीडिया से नाराज़ हैं. लेकिन कहानी वहां ख़त्म नहीं हुई, बल्कि वहीं से शुरू हुई. कप्तान के  तौर पर धोनी हमेशा अपनी बात मज़बूती से रखते आए हैं और अपने पसंदीदा खिलाड़ियों के लिए वह चयनकर्ताओं से खुल कर लड़ते भी हैं. लेकिन सा़फ था कि वह टी-20 वर्ल्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफी के  लिए भेजी जाने वाली टीम से ख़ुश नहीं थे. धोनी की यह नाराज़गी शायद अब तक ख़त्म नहीं हई है. अब ज़रा ऑस्ट्रेलिया सीरीज़ के  दौरान धोनी के  बयानों पर नज़र डालिए तो ऐसा लगेगा कि जैसे वह लाचार हैं. टीम उनके   साथ वैसे नहीं खड़ी है, जैसी कुछ महीने पहले तक थी. वह लगातार यह कहते रहे कि टीम में प्रतिभा की कमी नहीं है, बल्कि हार की वजह खिलाड़ियों का रवैया है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आख़िर ऐसा हुआ क्या कि धोनी क्रिकेट से विमुख लग रहे हैं.

जानकार मानते हैं कि वह कुछ खिलाड़ियों को टीम में शामिल करना चाहते हैं, जबकि चयनकर्ता इसके  लिए राज़ी नहीं हैं. साथ ही वह चाहते हैं कि कुछ खिलाड़ियों को बाहर किया जाए, लेकिन उनकी इस बात के  लिए भी चयनकर्ता राज़ी नहीं हैं. ऐसे में धोनी ने पहले तो अपनी नाराज़गी का इज़हार किया, लेकिन अब वह इस बात में ज़्यादा दिलचस्पी ही नहीं ले रहे हैं कि टीम में कौन है, कौन नहीं. ऑस्ट्रेलिया सीरीज़ में व्यक्तिगत तौर पर उनका प्रदर्शन ख़राब नहीं रहा. एक शानदार शतक और एक अर्द्धशतक के  साथ उनकी बल्लेबाज़ी का औसत 57 रहा, लेकिन टीम औसत से ऊपर नहीं बढ़ पाई और रिकी पोंटिंग भारत को क़रीब-क़रीब मुंह चिढ़ा कर चले गए.

जबकि असलियत यह है कि भारत से ज़्यादा ऑस्ट्रेलिया की टीम परेशान थी. उनके   माइकल क्लार्क और ब्रैंड हैडिन जैसे बल्लेबाज़ औऱ नेथन ब्रैकन जैसे गेंदबाज़ भारत आए ही नहीं थे. यहां तक कि भारत में सीरीज़ के  दौरान ही उन्हें ब्रेट ली, जेम्स होप्स, हेनरी के  मोज़ेज़ जैसे खिलाड़ियों को गंवाना पड़ा. यहां तक कि उन्हें आख़िरी ग्यारह इकट्ठे करने में भी द़िक्क़त हो रही थी. ऐसे में पोंटिंग और धोनी की कप्तानी ने सीरीज़ के  नतीजे का फैसला किया. टीम इंडिया के  चयनकर्ताओं को समझना होगा कि टीम चुन कर ही उनका काम पूरा नहीं हो जाता, बल्कि उनकी ज़िम्मेदारी में टीम का प्रदर्शन और उसकी वजहें भी आती हैं. और अगर कहीं चयनकर्ताओं और कप्तान के बीच टकराव है तो उसे तुरंत दूर करना होगा, क्योंकि यही ज़िम्मेदारी उन्हें दी गई है. श्रीलंका से मुक़ाबला जारी है. यह वही टीम है जिसके  ख़िला़फ वन-डे सीरीज़ जीतकर भारत ने इतिहास रचा था. टीम इंडिया को उसके  लगातार शानदार प्रदर्शन पर नज़र रखनी होगी. टीम में कौन हो सकता था, कौन नहीं, इस पर विचार करने का व़क्तगुज़र चुका है. वरना धोनी का यह बयान ख़ुद में काफी कुछ कहता है कि मुझे नहीं पता कि मैं 2011 वर्ल्ड कप तक कप्तान रहूंगा या नहीं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.