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पैरालिंपिक खेल : भारतीय खिलाड़ियों ने बढ़ाया देश का मान
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पैरालिंपिक खेल : भारतीय खिलाड़ियों ने बढ़ाया देश का मान

thangaveluअभी कुछ ही दिन पहले रियो ओलम्पिक में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन को लेकर तमाम सवाल खड़े किए जा रहे थे. ओलम्पिक की नाकामी का पोस्टमार्टम भी हो रहा है लेकिन उसी जगह पर पैरालिम्पिक खिलाड़ियों ने भारत का झंडा बुलंद कर दिया है. रियो ओलम्पिक के दर्द को भले ही सिंधु व साक्षी ने थोड़ा कम किया हो पर पैरालिम्पिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने स्वर्णिम सफलता के बलबूते पूरे देश को गौरव का एहसास कराया है. उनका प्रदर्शन इस बात का गवाह है कि अक्षम होना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि उसे ताकत के रूप में लेना भी बड़ी बात है. दिव्यांग या विकलांग होने बाद कुछ लोग जिदंगी की जंग हार जाते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपने हुनर में इतना रम जाते हैं कि वह आए दिन नया इतिहास बनाने में विश्‍वास रखते हैं. पैरालिम्पिक खेलों में भी कुछ इसी तरह का देखने को मिला. इसका ताजा उदाहरण देवेंद्र झाझरिया का गोल्ड मेडल है. मरियप्पन थांगावेलू के ऊंची कूद में स्वर्णिम प्रदर्शन ने पूरे भारत को जश्‍न मनाने का मौका दिया है. इतना ही नहीं दीपा मलिक ने 4.61 मीटर शॉटपट फेंककर भारतीय पैरालिम्पिक खेलों के इतिहास में नया प्रतिमान स्थापित किया है. वरुण सिंह भाटी का पोलियो होने के बावजूद कभी हार न मानने का जज्बा भी पैरालिम्पिक खेलों में देखने को मिला. उन्होंने कांस्य पदक जीतकर देश का मान बढ़ा दिया है. हालांकि यह बात भी सत्य है कि पैरालिम्पिक खेलों को उतनी तवज्जो नहीं मिलती, जितनी आम खेलों को मिलती है.

इतिहास के पन्नों को पलटें तो ओलम्पिक से बेहतर प्रदर्शन करते हैं पैरालिम्पिक खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी. साल 1972 में हैडिलवर्ग पैरालिम्पिक खेलों में भारत के मुरलीकांत पेटकर ने तैराकी में स्वर्ण जीतकर भारत को इस खेल में नई पहचान दिलाई थी. बहुत कम लोग जानते हैं कि मुरलीकांत पेटकर टेबल टेनिस में भी भाग ले चुके हैं, लेकिन असली कामयाबी उन्हें तैराकी में मिली. 1984 में स्टोक मैंडाविल पैरालिम्पिक खेलों में भारत की तरफ से जोगिंदर सिंह बेदी ने एक सिल्वर और दो ब्रांज मेडल जीतकर पैरालिम्पिक खेलों में नया इतिहास बनाया. 2004 में देवेंद्र ने भाला फेंक में स्वर्ण पदक जीता था. इतना ही नहीं राजिंदर ने पावरलिफ्टिंग में पदक अपने नाम किया, जबकि 2012 में गिरिशा ने ऊंची कूद में रजत पदक पर कब्जा किया था. यह बातें अतीत की थीं लेकिन वर्तमान में भी भारतीय खिलाड़ी हर दिन नया इतिहास बना रहे हैं. रियो पैरालिम्पिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन काबिले-तारीफ है. देवेंद्र झाझरिया की बात की जाए तो उन्होंने अपने दमदार प्रदर्शन से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. देवेंद्र ने 63.97 मीटर में भाला फेंककर विश्‍व रिकॉर्ड स्थापित किया. राजस्थान के चुरू जिले के रहने वाले झाझरिया का बिजली के करंट लगने के कारण दायां हाथ खराब हो गया था लेकिन उन्होंने इसके बाद कड़ी मेहनत करते हुए स्कूली स्तर पर जानदार प्रदर्शन किया. इसके बाद जैवलिन थ्रो में वह लगातार कामयाबी की ओर बढ़ते रहे. राज्य स्तर पर वह कई बार चैम्पियन भी रहे. उनकी असली प्रतिभा साल 2004 के एथेंस में पैरा ओलंपिक खेलों में देखने को मिली जब उन्होंने वहां 62.15 मीटर के साथ नया रिकॉर्ड बना डाला. इससे पूर्व विश्‍व चैम्पियनशिप में वह स्वर्ण जीत चुके हैं. 2014 के एशियन गेम में सिलवर मेडल जीतकर उन्होंने अपना लोहा मनवाया था. 2001 में बुसान में आयोजित प्रतियोगिता में पहली बार गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने सनसनी फैला दी थी. देवेंद्र को इस शानदार सफलता के लिए 2005 में अर्जुन अवॉर्ड और 2012 में पद्मश्री भी दिया गया. दूसरी ओर मरियप्पन थांगावेलू एक बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं. दरअसल उनकी मां सरोजा सब्जी बेचकर किसी तरह से घर चलाती हैं. मरियप्पन जब पांच साल के थे एक सरकारी बस ने उन्हें टक्कर मार दी जिसमें उनका पैर खराब हो गया. 17 साल मुकदमा लड़ने के बाद दो लाख रुपये का मुआवजा मिला. पढ़ाई के दौरान मरियप्पन के हुनर को पहचाना गया और तराशा गया, जिसके बाद वे बड़े मंच पर चमक दिखा रहे हैं. अब जब रियो पैरालिम्पिक खेलों में उन्होंने पदक जीता तो उनके ऊपर इनामों की बौछार होने लगी है.

एक और पदक विजेता 45 साल की दीपा मलिक ने शॉटपुट में रजत पदक जीतकर साबित किया कि अगर हौसला हो तो इंसान कुछ भी कर सकता है. दीपा चल फिर नहीं सकती हैं लेकिन रियो में उन्होंने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया है. दीपा मलिक की जिदंगी देखें तो शायद उस सीमा पर कोई भी व्यक्ति टूट जाए. लेकिन उन्होंने अपने हौसले से जुग जीत लिया. दीपा रिटायर्ड कर्नल बिक्रम सिंह की पत्नी हैं. उन्हें तब लकवा मार गया था, जब उनके पति करगिल में देश के लिए युद्ध लड़ रहे थे. अनगितन ऑपरेशनों के बावजूद उन्हें व्हीलचेयर पर जिदंगी गुजारनी पड़ रही है, लेकिन उन्होंने शॉटपुट की दुनिया में अपना अलग मुकाम बना लिया है. कुल मिलाकर दिव्यांग खिलाड़ियों के जज्बे को सलाम करना चाहिए, जिन्होंने अपने प्रदर्शन की बदौलत देश का नाम रौशन किया है.

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