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Tag: अंग्रेज

दारिद्रय क्यों और कैसे?

दारिद्रय क्यों और कैसे?

अट्ठारहवीं सदी में भारत के गांवों एवं कृषि का स्वरूप क्या था, इस विषय में काफी शोध हुआ है. इससे पता चलता है कि भारत के गांवों में खेती और उद्योग दोनों चलते थे. कोई भूमिहीन मज़दूर नहीं था. छोटे...

क्या इस समर्पण से शांति आएगी

क्या इस समर्पण से शांति आएगी

यूं तो पूर्वोत्तर में कार्यरत अधिकतर अलगाववादी संगठन धीरे-धीरे शांति के रास्ते पर आने के लिए तैयार हो रहे हैं और सच तो यह है कि केंद्र और राज्य सरकार इसका स्वागत भी कर रही हैं, लेकिन सवाल यह उठता...

यह धर्म निरपेक्षता नहीं है

यह धर्म निरपेक्षता नहीं है

भारतीय इतिहास में तुर्की की एक अहम भूमिका रही है. भारत के विभाजन के केंद्र में भी इसका नाम रहा और इसके बाद भारत द्वारा धर्मनिरपेक्षवाद अपनाए जाने के पीछे भी वजह तुर्की ही था. प्रथम विश्व युद्ध के व़क्त...

क्रांतिकारियों का पहला धमाका

क्रांतिकारियों का पहला धमाका

22 जून, 1897 को रैंड को मौत के घाट उतार कर भारत की आज़ादी की लड़ाई में प्रथम क्रांतिकारी धमाका करने वाले वीर दामोदर पंत चाफेकर का जन्म 24 जून, 1869 को पुणे के ग्राम चिंचवड़ में प्रसिद्ध कीर्तनकार हरिपंत...

मेवात का सामाजिक-आर्थिक परिवेश और तबलीगी जमात

मेवात का सामाजिक-आर्थिक परिवेश और तबलीगी जमात

मेवात इलाक़े में अधिकतर ज़मीनों पर खेती मियो किसान ही करते थे, लेकिन कुछ चौधरियों (स्थानीय समुदायों के नेताओं) को छोड़कर बड़े जमींदारों में उनकी गिनती नहीं थी. अधिकांश मियो छोटे किसान ही थे और ग़रीबी की हालत में जीते...

स्‍वाधीनता संग्राम और मुसलमान

स्‍वाधीनता संग्राम और मुसलमान

इस साल कांग्रेस अपना 125वां स्थापना दिवस मना रही है. भारत के सभी धर्मों के नागरिकों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ज़रिए स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान दिया, परंतु हमारे नेताओं की बहुसंख्यकवादी मानसिकता और स्कूली पाठ्‌यक्रम तैयार करने वालों...

104 वर्ष की हुई पुलिस अकादमी

104 वर्ष की हुई पुलिस अकादमी

सन 1660 में राजा ऊदनशाह द्वारा निर्मित किए गए विशालकाय दुर्ग को आज सागर में जवाहरलाल नेहरू पुलिस अकादमी के नाम से जाना जाता है. 104 वर्ष की उम्र में आज भी इस अकादमी का वैभव और गरिमा वैसे ही...

गांधी जी और बटक मियां

गांधी जी और बटक मियां

लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते व़क्त राष्ट्रपिता गांधी ने जो संवाद लिखा था, वह बाद में हिंद स्वराज के नाम से पुस्तकाकार भी छपा. इस पुस्तक के प्रकाशन के सौ साल पूरे होने पर बुद्धिजीवियों के बीच जमकर बहस-मुहाबिसा हुआ....

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