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Tag: Maoist

संभलिए, अभी संभलने का मौक़ा है

किसी भी सरकार को सरकार की तरह व्यवहार करना चाहिए. सरकार का मतलब होता है कि वह देश में रहने वालों के जीवन की, भोजन की, काम की, स्वास्थ्य की और उनके सुख-शांति से रहने की आज़ादी की गारंटी दे....

आंखों देखा नक्‍सलवाद

आंखों देखा नक्‍सलवाद

विदेशी हथियारों से लैस नक्सलवादी समूहों के पास सरकार से अधिक मज़बूत सूचनातंत्र है. गहराई तक जानें तो, इन नक्सलवादी समूहों के पास पैसा, हथियार, योजना सभी कुछ उम्मीदों से कहीं ज़्यादा है. लेकिन, ये समूह जन विश्वास और जन...

ऑपरेशन ग्रीन हंट सफलता पर सवालिया निशान

ऑपरेशन ग्रीन हंट सफलता पर सवालिया निशान

काफी जद्दोजहद के बाद झारखंड में ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू हुआ. केंद्र सरकार के दिशानिर्देश पर सूबे में उग्रवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाने और नक्सलियों पर नकेल कसने के उद्देश्य से यह अभियान जारी है.

जो बोलेगा, सो झेलेगा

जो बोलेगा, सो झेलेगा

हिंदी के मशहूर लेखक एवं नाटककार मुद्राराक्षस बेहद गुस्से में थे. आक्रामक मुद्रा और तीखे स्वरों में लगभग चीखते हुए उन्होंने सवाल किया कि यह देश किसका है, किसके लिए है. हत्यारे, लुटेरे, बलात्कारी, दलाल, तस्कर खुलेआम घूम रहे हैं....

जनसंघर्ष मोर्चा देगा राजनीतिक विकल्प

जनसंघर्ष मोर्चा देगा राजनीतिक विकल्प

जनसंघर्ष मोर्चा देश की लोकतांत्रिक और बदलाव चाहने वाली ताक़तों का राष्ट्रीय मंच है. इसमें समाजवादी, दलित, आदिवासी-वनवासी और वामपंथी आंदोलन से जुड़ी ताक़तें शामिल हैं. इसका सबसे प्रमुख आंदोलन है, दाम बांधो-काम दो अभियान.

भारत-बांग्‍लादेश संबंध और पूर्वोत्‍तर का मुद्दा

भारत-बांग्‍लादेश संबंध और पूर्वोत्‍तर का मुद्दा

काफी उम्मीदों और ढेर सारी संभावनाओं के बावजूद भारत और बांग्लादेश के संबंधों में अपेक्षित सुधार नहीं आ सका है. भौगोलिक, भाषाई, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से दोनों देश एक-दूसरे के का़फी नज़दीक रहे हैं. इसके बावजूद अविश्वास और...

सरकार, जनता और मानवाधिकार का भ्रम

सरकार, जनता और मानवाधिकार का भ्रम

भारतीय लोकतंत्र में लोक और तंत्र के बीच जो गहरी खाई है, उससे न स़िर्फ लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास हुआ है, बल्कि लोगों के गरिमामय जीवन जीने के लिए ज़रूरी अधिकारों मसलन मानवाधिकार का भी हनन हुआ है. यह सिलसिला...

क्या वे सजग प्रहरी हैं?

क्या वे सजग प्रहरी हैं?

इस बात पर बहस हो सकती है कि किसी आदमी के लिए कुत्ता किसिम का, कुत्ता कहीं का जैसा जुमला गाली है या व़फादारी की पदवी. गांव-गली के कुत्ते अपने इलाक़े की पहरेदारी करते हैं. कहीं भी कोई ग़ैर मामूली...

जन सुनवाई का सामना क्यों जरूरी?

जन सुनवाई का सामना क्यों जरूरी?

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल नरसिंहन ने कभी नहीं चाहा कि केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम सात जनवरी की दंतेवाड़ा जन सुनवाई में हिस्सा लें. इस बात का गवाह है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखा गया उनका वह पत्र, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री से...

‘माओवाद’ या ‘मै—मै वाद’?

‘माओवाद’ या ‘मै—मै वाद’?

आपकी तारीफ? मैं माओवादी हूं पिछले दिनों पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ झारखंड व उडीसा में जो हत्याएं लूटपाट तोडफोड हुई. वह मैंने ही की थीं. तारीफ कर रहे हो अपनी या गन हल्का करने के लिए अपना गुनाह कुबूल कर रहे...

माओवादियों का एक मोहरा भर है छत्रधर

माओवादियों का एक मोहरा भर है छत्रधर

पुलिस कुछ न करे तो मुश्किल, कर गुज़रे तो और ज़्यादा मुश्किल! माओवादियों के मोहरे छत्रधर की गिरफ़्तारी इसका जीता जागता प्रमाण है. यह दोहरापन आख़िर हमें कहां ले जाएगा?

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